दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदुओं के सर्वोच्च पदों में से एक शंकराचार्य के पद पर बैठे स्वघोषित अविमुक्तेश्वरानंद जी को लेकर ऐसी ऐसी बातें हो रही हैं, लेकिन क्या किया जाय जब वो खुद योगी जी को जो इतना अच्छा काम कर रहे हैं उन्हें मुगल बता रहे है और अखिलेश जिसकी सरकार ने उन्हें दौड़ा दौड़ा के मारा गया था उससे गलबहियां कर रहे है... तो क्या जनता बोलेंगी नहीं? अब योगी जी ने कालनेमियों से समाज को अवगत कराना चाहे तो ये फिर कूद पड़े मानो इन्हें कालनेमी बोल दिया गया हो....!
अब समझ ये नहीं आया कि योगी जी ने साधु वेश में बैठे कालनेमियों से समाज को सतर्क रहने के लिए कहा तो महाराज को क्यों बुरा लग गया? क्या समाज में कालनेमियों का अभाव है? क्या ऐसे लोगों का अभाव है जो साधु बनकर बैठे है लेकिन एजेंडा किसी मिशनरी का , जेहादी संगठन का , वामपंथियों का या राजनीतिक पार्टियों का चला रहे हों.. ऐसे लोगों को कालनेमी नहीं तो क्या कहा जाए और ऐसे लोगों से सावधान रहने के लिए कहना क्या योगी जी की गलती है...

