समय हो तो पढ़े,फिर सोचियेगा"
बहू ने अदालत में हाथ जोड़कर कहा— 'जज साहब... अगर मेरे पति को अपने माँ-बाप नहीं चाहिए, तो मुझे मेरे माँ-बाप लौटा दीजिए।'"
जिला न्यायालय का कमरा नंबर 9 लोगों से खचाखच भरा हुआ था।
सुबह के दस बजे थे, लेकिन अदालत के बाहर असामान्य भीड़ लगी थी।
हर कोई एक ही बात पूछ रहा था—
"क्या हुआ है?"
"किसका केस है?"
एक अधेड़ आदमी बोला—
"सुना है एक बहू अपने ही पति के खिलाफ अदालत पहुँच गई है।"
दूसरा हँस पड़ा—
"अरे, फिर वही दहेज या तलाक का मामला होगा।"
तभी कोर्ट का दरवाज़ा खुला।
अंदर का नज़ारा देखकर लोगों की हँसी गायब हो गई।
कटघरे में एक लगभग अट्ठाईस साल की युवती खड़ी थी।
चेहरे पर आँसू थे, लेकिन आँखों में अजीब-सा आत्मविश्वास।
उसका नाम था नंदिनी।
उसके सामने उसका पति राहुल, उसके दोनों बड़े भाई और उनकी पत्नियाँ खड़ी थीं।
पीछे बेंच पर बैठे थे दो बूढ़े चेहरे...
बहत्तर वर्षीय गोपाल प्रसाद और उनकी पत्नी शांति देवी।
दोनों की आँखें झुकी हुई थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे वे अदालत में नहीं, अपनी किस्मत के कटघरे में बैठे हों।
जज ने फाइल खोली।
कुछ पन्ने पढ़े।
फिर चश्मा उतारकर नंदिनी की ओर देखा।
"तुमने यह याचिका दायर की है?"
"जी, माननीय न्यायालय।"
"तुम्हारी माँग क्या है?"
पूरा कोर्टरूम शांत हो गया।
नंदिनी ने काँपते हाथ जोड़ लिए।
फिर बोली—
"अगर कानून इजाज़त देता है... तो मेरे पति को नहीं... मेरे सास-ससुर को मुझे दे दीजिए।"
एक पल के लिए अदालत में बैठे सभी लोग जैसे पत्थर बन गए।
जज भी कुछ सेकंड तक उसे देखते रह गए।
उन्होंने दोबारा पूछा—
"तुम्हें तलाक नहीं चाहिए?"
"नहीं।"
"पति से गुज़ारा भत्ता?"
"नहीं।"
"पति की संपत्ति में हिस्सा?"
"नहीं साहब..."
"मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
"बस... मेरे माँ-बाप जैसे सास-ससुर मुझे दे दीजिए।"
पीछे बैठी शांति देवी का बाँध टूट गया।
उन्होंने अपना मुँह आँचल से ढक लिया।
लेकिन दूसरी तरफ खड़ा राहुल गुस्से से भर उठा।
"ड्रामा मत करो नंदिनी!"
"कोर्ट में रोने से कुछ नहीं होगा।"
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
जज ने राहुल से पूछा—
"तुम क्या कहना चाहते हो?"
राहुल ने बिना किसी झिझक के कहा—
"साहब, मेरे पिताजी रिटायर हो चुके हैं। माँ भी बीमार रहती हैं। हम तीनों भाई नौकरी करते हैं। किसी के पास इतना समय नहीं कि हर समय इनकी सेवा करे।"
"हमने शहर के सबसे अच्छे वृद्धाश्रम में बात कर ली है। वहाँ डॉक्टर हैं, नर्स हैं, सारी सुविधाएँ हैं।"
"यही इनके लिए बेहतर है।"
इतना सुनते ही गोपाल प्रसाद की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उन्होंने धीमे से कहा—
"बेटा... अगर सच में तुम्हें बोझ लग रहे हैं... तो हमें वहीं छोड़ आओ।"
"कम से कम रोज़-रोज़ यह सुनना तो नहीं पड़ेगा कि हम तुम्हारी ज़िंदगी पर भार हैं।"
राहुल चुप रहा।
उसने अपने पिता की तरफ देखा तक नहीं।
तभी सबसे बड़े भाई की पत्नी बोली—
"जज साहब, हम गलत नहीं हैं।"
"आजकल की ज़िंदगी बहुत मुश्किल है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, नौकरी का तनाव..."
"इतनी ज़िम्मेदारियाँ कौन उठाए?"
दूसरी बहू भी बोली—
"हम बुरे नहीं हैं..."
"बस मजबूर हैं।"
अदालत में बैठे कई लोगों ने सिर हिलाया।
उन्हें लगा शायद बात सही है।
लेकिन तभी...
नंदिनी ने अपने बैग से एक पुराना, पीला पड़ चुका लिफाफा निकाला।
"माननीय न्यायालय..."
"फैसला सुनाने से पहले... मैं सिर्फ पाँच मिनट चाहती हूँ।"
"फिर आप जो उचित समझें, वही कीजिए।"
जज ने अनुमति दे दी।
नंदिनी ने काँपते हाथों से वह लिफाफा खोला।
उसमें से एक पुरानी फोटो निकली।
फोटो में एक छोटी-सी बच्ची अपने पिता के कंधे पर बैठी मुस्कुरा रही थी।
नंदिनी ने फोटो सबको दिखाते हुए कहा—
"यह मैं नहीं हूँ..."
"यह मेरी सासू माँ हैं..."
"और इन्हें कंधे पर बैठाने वाले मेरे बाबूजी हैं।"
फिर उसने दूसरी फोटो निकाली।
इस बार तस्वीर में एक दुबली-पतली लड़की दुल्हन बनी खड़ी थी।
उसके बगल में गोपाल प्रसाद मुस्कुरा रहे थे।
नंदिनी की आवाज़ भर्रा गई—
"यह मेरी शादी की तस्वीर है..."
"और उस दिन बाबूजी ने सबके सामने एक बात कही थी..."
वह कुछ पल के लिए रुक गई।
पूरा कोर्ट उसकी ओर देख रहा था।
उसने आँसू पोंछे और बोली—
"उन्होंने कहा था— 'आज से यह हमारे घर की बहू नहीं... हमारी बेटी है। अगर कभी मेरी बेटी की आँख में आँसू आए, तो सबसे पहले मैं रोऊँगा।'"
इतना कहते ही गोपाल प्रसाद फूट-फूटकर रो पड़े।
अदालत में बैठे लोग भी भावुक हो गए।
लेकिन किसी को यह नहीं पता था...
कि अगले पाँच मिनट में नंदिनी ऐसा सच बताने वाली थी...
जिसे सुनकर उसके अपने पति की नज़रें भी हमेशा के लिए झुक जाने वाली थीं...
पूरे कोर्टरूम में ऐसी खामोशी थी कि किसी की साँसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
नंदिनी ने काँपते हाथों से एक पुरानी डायरी जज साहब की मेज़ पर रख दी।
"माननीय न्यायालय... यह बाबूजी की डायरी है।"
"इसमें कोई कविता नहीं... एक पिता की पूरी ज़िंदगी लिखी है।"
जज ने पहला पन्ना खोला।
ऊपर तारीख लिखी थी— 12 जुलाई, 2003
नीचे लिखा था—
"आज राहुल की इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस जमा करनी थी। पैसे कम पड़ गए। शांति ने अपनी माँ की आख़िरी निशानी—सोने की चूड़ियाँ बेच दीं। राहुल को बताया कि चूड़ियाँ बैंक के लॉकर में रख दी हैं... कहीं उसे दुख न हो।"
राहुल का सिर अपने आप झुक गया।
जज ने दूसरा पन्ना खोला।
"आज बड़े बेटे को टाइफाइड था। तीन रातों से सोया नहीं हूँ। भगवान, मेरी उम्र भी मेरे बच्चों को दे देना।"
तीसरा पन्ना...
"आज छोटे बेटे की पहली नौकरी लगी। उसने मिठाई खिलाई। उसने नहीं देखा... लेकिन मिठाई खाते समय मेरी आँखों से आँसू निकल आए थे। लगता है अब मेरी मेहनत सफल हो गई।"
पूरा अदालत कक्ष शांत था।
तभी नंदिनी बोली—
"साहब... डायरी यहीं खत्म नहीं होती।"
उसने आख़िरी पन्ना खोल दिया।
उस पर लिखे शब्द पढ़ते ही जज साहब भी कुछ पल के लिए रुक गए।
"अगर कभी मैं बूढ़ा हो जाऊँ... और मेरे बच्चे मुझे अपने साथ न रख सकें... तो उन्हें दोष मत देना। मैंने उन्हें बड़े सपने देखना सिखाया है... शायद उन सपनों में मेरे लिए जगह कम पड़ जाए।"
यह सुनते ही गोपाल प्रसाद ने चेहरा दोनों हाथों से ढक लिया।
शांति देवी की सिसकियाँ पूरे कमरे में गूँजने लगीं।
राहुल अब तक रो चुका था।
लेकिन नंदिनी अभी रुकी नहीं।
उसने अपने पति की तरफ देखा और बोली—
"राहुल... याद है हमारी शादी के दूसरे साल तुम्हारी नौकरी चली गई थी?"
राहुल ने धीरे से सिर हिलाया।
"तुम्हें आज तक लगता है कि हमने बैंक से लोन लेकर घर चलाया था..."
"सच जानना चाहते हो?"
राहुल ने पहली बार नंदिनी की आँखों में देखा।
नंदिनी बोली—
"बैंक ने तुम्हारा लोन रिजेक्ट कर दिया था।"
"उस रात बाबूजी चुपचाप अपने दोस्त के पास गए..."
"और अपनी पुश्तैनी पाँच बीघा ज़मीन गिरवी रख दी।"
"ताकि तुम्हें कभी यह महसूस न हो कि तुम बेरोज़गार हो।"
राहुल जैसे बिजली का झटका लगने पर पीछे हट गया।
"क्या...?"
गोपाल प्रसाद तुरंत बोले—
"नंदिनी... बस कर बेटी।"
"बच्चों को यह सब जानने की ज़रूरत नहीं।"
नंदिनी रोते हुए बोली—
"नहीं बाबूजी..."
"आज सच सामने आएगा।"
"क्योंकि जिस त्याग को छिपा दिया जाए... उसकी कीमत अगली पीढ़ी कभी नहीं समझती।"
पूरा अदालत कक्ष आँसू पोंछ रहा था।
लेकिन सबसे बड़ा सच अभी बाकी था...
नंदिनी ने अपने बैग से एक अस्पताल की पुरानी फाइल निकाली।
उसे देखते ही शांति देवी घबरा गईं।
"बेटी... वह मत दिखा..."
नंदिनी बोली—
"आज यह भी दुनिया को जानना चाहिए..."
"कि एक माँ अपने बेटे के लिए कितना छिपा सकती है..."
नंदिनी ने काँपते हाथों से अस्पताल की पुरानी फाइल जज साहब के सामने रख दी।
"माननीय न्यायालय... यह फाइल आज से पाँच साल पुरानी है।"
जज ने फाइल खोली।
अंदर ऑपरेशन के कागज़, दवाइयों की पर्चियाँ और अस्पताल के बिल रखे थे।
नंदिनी बोली—
"राहुल... तुम्हें याद है, जब तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ था?"
राहुल की आँखें फैल गईं।
"हाँ..."
"डॉक्टर ने कहा था कि ऑपरेशन तुरंत करना होगा।"
"लेकिन तुम्हें आज तक एक सच नहीं पता।"
राहुल घबराकर बोला—
"कौन-सा सच?"
नंदिनी ने बिल उठाया।
"ऑपरेशन के लिए आठ लाख रुपये चाहिए थे।"
"तुम्हारे दोनों भाइयों की अपनी-अपनी मजबूरियाँ थीं। किसी के पास इतने पैसे नहीं थे।"
"तब बाबूजी ने अपनी आख़िरी बची हुई खेती बेच दी।"
"और माँजी ने अपनी माँ की दी हुई मंगलसूत्र और सारे गहने गिरवी रख दिए।"
"लेकिन जब तुम ठीक होकर घर लौटे..."
"तो तुमसे कहा गया कि कंपनी के मेडिकल इंश्योरेंस ने सारा खर्च उठा लिया।"
राहुल के हाथ काँपने लगे।
वह अपने पिता की ओर देखने लगा।
गोपाल प्रसाद ने नज़रें झुका लीं।
धीरे से बोले—
"बेटा... अगर उस समय सच बता देता..."
"तो तुम्हें अपनी जान बचने की खुशी कम और हमारे त्याग का बोझ ज़्यादा महसूस होता।"
"इसलिए हमने झूठ बोल दिया।"
राहुल वहीं घुटनों के बल बैठ गया।
उसकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।
वह रोते हुए बोला—
"बाबूजी... मैंने तो कभी पूछा तक नहीं..."
गोपाल प्रसाद ने काँपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा।
"हर पिता अपने बेटे से हिसाब नहीं माँगता बेटा..."
"बस चाहता है कि बुढ़ापे में उसे पराया मत समझना।"
पूरा अदालत कक्ष रो रहा था।
जज साहब ने कुछ क्षण आँखें बंद रखीं।
फिर उन्होंने अपना फैसला सुनाया—
"आज इस अदालत के सामने कानून से बड़ा प्रश्न इंसानियत का है।"
"माता-पिता कोई सामान नहीं हैं कि उनका बँटवारा कर दिया जाए।"
"वे स्वयं निर्णय करेंगे कि कहाँ रहना चाहते हैं।"
फिर उन्होंने गोपाल प्रसाद और शांति देवी से पूछा—
"आप दोनों क्या चाहते हैं?"
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
फिर गोपाल प्रसाद मुस्कुराए।
"साहब..."
"अगर हमारी बेटी नंदिनी तैयार हो..."
"तो हम उसके साथ रहना चाहेंगे।"
पूरा कोर्ट एक साथ उनकी ओर देखने लगा।
राहुल फूट-फूटकर रो पड़ा।
वह नंदिनी के पैरों में बैठ गया।
"मुझे माफ़ कर दो..."
"मैं माँ-बाप के होते हुए भी अनाथ जैसा सोचने लगा था।"
नंदिनी ने तुरंत उसे उठाया।
"माफी मुझसे नहीं..."
"उन दो लोगों से माँगो, जिन्होंने तुम्हें चलना सिखाया था।"
राहुल अपने माँ-बाप के चरणों में गिर पड़ा।
उसके दोनों बड़े भाई भी रोते हुए उनके पैरों से लिपट गए।
तीनों बहुएँ भी शांति देवी के गले लगकर रोने लगीं।
अदालत में मौजूद हर व्यक्ति खड़ा हो गया।
कई लोगों ने ताली नहीं बजाई...
क्योंकि उनके हाथ आँसू पोंछने में लगे थे।
जज साहब ने मुस्कुराकर कहा—
"आज अदालत ने कोई मुकदमा नहीं जीता..."
"आज एक परिवार हारने से बच गया।"
अगले दिन अख़बार की पहली सुर्ख़ी थी—
"बहू ने अदालत में माँगा सास-ससुर का साथ... बेटों ने माँगा माफ़ी का अधिकार।"
कहते हैं...
उस खबर को पढ़कर कई लोगों ने उसी दिन अपने माता-पिता को फोन किया।
कई बहुओं ने अपनी सास का हाथ पकड़कर कहा—
"माँ, जब तक मैं इस घर में हूँ... आपको कभी अकेला नहीं होने दूँगी।"
और कई बेटों ने पहली बार महसूस किया—
माता-पिता की सबसे बड़ी इच्छा हमारी कमाई नहीं होती...
बल्कि यह भरोसा होता है कि बुढ़ापे में उनका अपना घर उनसे कभी नहीं छिनेगा।
क्योंकि जिस घर में बहू बेटी बन जाए... और बेटे अपने संस्कार याद कर लें...
वहीं घर सचमुच मंदिर बन जाता है।
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