वाह रे मजा-हब जहां एक अब्बा अपनी ही नाबालिक बेटी को अपनी हवस का शिकार बना लेता है। इस मानसिकता से कोई कैसे भाईचारा नीभा सकता है ? और जो इनसे भाईचारा निभा सकता है एक संभवतः अपनी बेटी को भी....😞😞। कितनी दुर्गंध भरी है ये सोच जो अपनी बेटियों को भी नहीं सोचती वो काफिरों की बेटी को क्या ही छोड़ेंगी...
मालवानी मुस्लिम समाज की घटना जो शर्मनाक है। कैसे कैसे लोग है ? कैसी है उनकी नीयत? अपनी ही बेटी से जबरजस्ती ? और केवल अब्बा ही नहीं चाचा जान भी हैवान। अब जिन्हें बचपन से हूरों के सपने दिखाए जाए उनके लिए क्या बेटी, क्या बीवी और क्या बहन... सब मौज मस्ती का साधन हो हैं।

