सोचकर देखिए जरा.. अभी जिहादियों के हाथ में केवल पत्थर हैं तब पुलिस का ये हाल है। अगर ये अपने अपने हथियार ले आते तब क्या होता? आप इनके भरोसे बैठे हैं? जिहादियों के पास कितने ही हथियारों के जखीरे पकड़े जा रहे हैं उससे मामले की गंभीरता को समझना चाहिए। हाथ में संविधान लेकर चलने वाले,अपने बाप का संविधान बताने वाले ऐसी घटनाओं पर किस बिल में घुस जाते हैं?
कोर्ट और पुलिस संवैधानिक व्यवस्था से बाहर आते हैं क्या? हो सकता है किसी को बुरा लग जाए लेकिन इस निर्णायक युद्ध में मुझे तो जिहादियों के पक्ष में वो अंबेडकरवादी भी खड़े दिखाई देते हैं जिन्होंने अपने घर से मंदिर हटा दिए,दिन रात भगवान को गालियां देते है,सनातन संस्कृति को गालियां देते हैं।
जब भी सामना होगा ये मीरजाफर की औलादें इस्लामिक ताकतों के साथ खड़ी दिखाई देंगी। क्योंकि इन लोगों ने कभी भी ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं किया। ना संदेशखली में हजारों दलित महिलाओं से हुए बलात्कार का विरोध किया। ना मुर्शिदाबाद में मारे गए हिंदुओं पर कुछ बोला। ना बांग्लादेश में जो दलित मारे जा रहे हैं उस पर कुछ बोलते हैं। विरोध ना करने का मतलब ही है कि उनके हर काम में साथ खड़े हैं।
अन्य हिंदुओं के लिए ना सही लेकिन कम से कम जिहादी जब दलितों पर अत्याचार करता है उस पर तो बोलो? दिखाओ तो सही तुम लोग दलित हितैषी हो ना की देवबंद के वेतन भोगी कर्मचारी?
साभार
अवधेश प्रताप

