अगर किसी ड्राइवर को मराठी ना बोल पाने पर पीटा गया और उसके बाद ₹35,000 का जुर्माना लगाया गया, तो यह सिर्फ भाषा का मुद्दा नहीं रह जाता - यह कानून, रोज़गार और इंसानी सम्मान का सवाल बन जाता है।मराठी सीखाना गलत नहीं है। स्थानीय भाषा का सम्मान भी होना चाहिए।लेकिन सवाल यह है-क्या भाषा न बोल पाने की सज़ा मारपीट हो सकती है? क्या गरीब ड्राइवर की रोज़ी-रोटी पर ₹35,000 का बोझ डालना सही है?
अगर आज ड्राइवर है, तो कल सवाल दूसरे कामगारों पर भी उठ सकता है दूध वाला, सब्जी वाला, दुकानदार, डिलीवरी वर्कर, नाश्ता बेचने वाला या मजदूर।भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, डर और रोज़गार छीनने का हथियार नहीं।और अगर आज ड्राइवर है, तो कल सवाल दूसरे कामगारों पर भी उठ सकता हैदूध वाला, सब्जी वाला, दुकानदार, डिलीवरी वर्कर, नाश्ता बेचने वाला या मजदूर ।भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, डर और रोज़गार छीनने का हथियार नहीं।
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