"हाँ, मैंने अपनी पत्नी को मार दिया!"... बेंगलुरु के एक पॉश सीनियर लिविंग अपार्टमेंट से आई ये गूंज पूरे देश को झकझोर रही है। आखिर क्यों एक 76 साल के रिटायर्ड ISRO वैज्ञानिक ने अपनी ही जीवनसंगिनी की जान ले ली? वजह कोई नफरत या जायदाद नहीं, बल्कि एक 'खौफनाक डर' था। वी. नागेश्वर राव, जिन्होंने देश के बड़े स्पेस मिशन में योगदान दिया, आज सलाखों के पीछे हैं। वजह? उन्हें चिंता थी कि उनके मरने के बाद उनकी बीमार पत्नी का ख्याल कौन रखेगा?
इकलौती बेटी सात समंदर पार अमेरिका में है, पास में कोई दूसरा सहारा नहीं, और इसी अकेलेपन की बेबसी ने एक होनहार वैज्ञानिक को कातिल बना दिया। उन्होंने तौलिये से अपनी पत्नी संध्या का गला घोंटा और फिर शांति से बैठकर पुलिस का इंतज़ार किया। पुलिस भी दंग है कि ये एक क्रूर अपराध है या हमारे समाज में बुजुर्गों के अकेलेपन की एक चीख? क्या आप इसे एक हत्या मानते हैं या एक बेबस इंसान का आखिरी खौफनाक फैसला
पहले एक बच्चा पैदा करो उसके बाद चाहे कितना भी पैसा लगे उसे विदेश भेजो फिर पागल की तरह अकेले पन में मानसिक विकृत हो जाओ ज्यादा काबिल बच्चे बनने के बाद मां बाप को कहा पूछते है
बच्चे तो वो घड़े होते है जिन्हें कूट पीट कर सेफ में लाया जाता है पर आज के मा बाप तो ऐसे पाल रहे उन्हें सामाजिक संस्कार से कोई लेना देना भी नहीं एक हम थे खेत में काम करते करते लठ फेर दिया जाता था
इतना ही काबिल बनाओ बच्चे को की उसे खुद का पता हो और मां बाप का भी थोड़ा बहुत पता हो
बॉम्बे की एक कहानी पढ़ी थी 2 बेटे दोनों विदेश में मां पैरालाइसिस की वजह से बेड पर थी पिता को अचानक हार्ट अटैक आया बड़ा बगला था अंदर से बंद रहता था पिता हार्ट अटैक से खत्म हो गया माता चल फिर। ही नहीं सकती थी वो बेड पर 4 दिनों बाद बिना दवा खाने के मर गई 20 दिनों में जब इलाके में दुर्गंध फैली पुलिस ने गेट थोड़ा तो अंदर कीड़े पड़े थे बॉडी में
यार ऐसी दौलत भी किस काम की बच्चों को फोन किया गया किसी माध्यम से तो बच्चे अंतिम समय में भी नहीं आए इसे क्या कहे किस काम का इतना पैसा न संस्कार न मां बाप के प्रति प्यार न सामाजिक व्यवहार ये कैसी प्रगति है

