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दुनिया में हर एक देश की अपनी एक भाषा, शिक्षा और ज्ञान की परंपरा होती है, उस भाषा को राष्ट्र की आत्मा कहा जाता है। इसी के आधार पर दुनिया के सारे देशों की अपनी एक पहचान होती है। उसी तरह हर भाषा और हर भाषा के हर शब्द का अपना इतिहास होता है।
जो भी शब्द, यदि किसी भाषा से जुड़ा है तो उसका अपना एक अलग इतिहास होता है। किसी ना किसी घटना के बाद कोई भी शब्द किसी भाषा में जोड़ा जाता है। इसलिए हर इंसान का यह दायित्व बनता है कि वह किसी भाषा से आने वाले शब्द को बिना जाने नहीं बोलना चाहिए। कई बार हमारे देश भारत में यह देखा जाता है कि स्वयं को ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी बताने की होड़ में लोग अंग्रेजी भाषा से लिए गए कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर देते हैं, जिसका उन्हें इतिहास और उस शब्द का सही अर्थ मालूम नहीं होता है। वे इसलिए ऐसा करते हैं, क्योंकि ऐसे शब्द या तो वो किसी के मुंह से बोलते हुए सुन लेते हैं या फिर किसी को कहीं उनका इस्तेमाल करते देख लेते हैं।
भारतीय समाज में आज एक सामान्य दृश्य देखने को मिलता है— स्कूल हो, दफ़्तर हो या सार्वजनिक मंच, लोग एक-दूसरे को 'सर' और 'मैडम' कहकर संबोधित करते हैं। धीरे-धीरे यह इतना सामान्य हो गया है कि बहुत से लोग यह भी भूल गए हैं कि इन शब्दों की उत्पत्ति कहाँ से हुई और क्या भारतीय समाज की अपनी कोई सम्मानजनक संबोधन परंपरा नहीं थी।
'सर' शब्द मूल रूप से अंग्रेज़ी का शब्द है, जिसकी जड़ें यूरोप की सामंती व्यवस्था में मिलती हैं। मध्यकालीन यूरोप में 'Sir' उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता था जिन्हें राजसत्ता द्वारा 'नाइटहुड' की उपाधि दी जाती थी। बाद में यह शब्द ब्रिटिश समाज में उच्च पदस्थ या वरिष्ठ व्यक्तियों के लिए सम्मानसूचक संबोधन बन गया। जब भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ, तब अंग्रेज अधिकारियों और शिक्षकों को भारतीयों से 'Sir' कहलवाया जाने लगा। इसी प्रकार 'Madam' फ्रांसीसी शब्द Madame से आया, जिसका अर्थ है किसी उच्च वर्ग की महिला। फ्रेंच में मैडम शब्द का उपयोग 'कोठा चलाने वाली बाई' के लिए किया जाता है। यानि वो महिला जो देह व्यापार करने वालों की मालकिन हो उसे 'मैडम' कहा जाता है।
औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने केवल भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर ही नियंत्रण नहीं किया, बल्कि हमारी मानसिकता और भाषा पर भी गहरा प्रभाव डाला। स्कूलों में विद्यार्थियों को अपने शिक्षकों को 'सर' और 'मैडम' कहने की आदत डाली गई, ताकि अंग्रेजी संस्कृति और सत्ता की श्रेष्ठता का भाव बना रहे। धीरे-धीरे यह आदत इतनी गहरी हो गई कि स्वतंत्रता के बाद भी वही संबोधन चलता रहा।
लेकिन यदि भारतीय परंपरा को देखें, तो हमारे यहाँ सम्मान देने की समृद्ध और आत्मीय परंपरा पहले से मौजूद थी। संस्कृत और भारतीय भाषाओं में श्रीमान, श्रीमती, आचार्य, गुरुजी, भैया, दीदी, महोदय, महोदया जैसे अनेक संबोधन रहे हैं, जिनमें केवल औपचारिक सम्मान ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्मीयता भी झलकती है। ये शब्द हमारी सभ्यता और भाषा की जड़ों से जुड़े हुए हैं।
आज प्रश्न यह नहीं है कि 'सर–मैडम' कहना गलत है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमें अपनी भाषा और परंपरा के शब्दों को भूल जाना चाहिए। यदि हम चाहें तो 'श्रीमान', 'श्रीमती', 'महोदय', 'गुरुजी' जैसे भारतीय संबोधनों का प्रयोग भी कर सकते हैं। इससे न केवल हमारी भाषा का सम्मान बढ़ेगा बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत होगी।
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*🌍 भारत में चलन क्यों ?*
किसी भी देश की भाषा एवं शिक्षा उस देश की आत्मा मानी जाती है। इसलिए जब अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया, तब भारत की संस्कृति, भाषा, ज्ञान आदि को बर्बाद करने के लिए भारत में इस तरह के शब्दों का चलन बढ़ाया, जिससे भारत की भाषा एवं संस्कृति को पूरी तरह से खत्म किया जा सके। इसका श्रेय लॉर्ड मैकाले को जाता है, जिनका पूरा नाम थॉमस बैबिंगटन मैकाले था।
भारतीय भाषा को पूरी तरह बिगाड़ने के उद्देश्य से वर्ष 1834 में लॉर्ड मैकाले को गवर्नर-जनरल की एक्जीक्यूटिव काउंसिल का पहला कानून सदस्य नियुक्त करके भारत भेजा गया था। लॉर्ड मैकाले वर्ष 1823 में बैरिस्टर बने जो कि प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि, निबंधकार, इतिहासकार और राजनीतिज्ञ भी थे, जिसको अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा पद्धति को बिगाड़ कर नई शिक्षा पद्धति बनाने की जिम्मेदारी सौंप दी।
तभी से हमारे देश में इस तरह के शब्दों का चलन आम बोल-चाल में बढ़ गया। लॉर्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा पद्धति को बदल कर एक नई शिक्षा पद्धति की शुरुआत की जो कि आज भी भारत में चल रही है।
अंग्रेज भले ही भारत से चले गए हों, लेकिन उनकी बनाई हुई कई मानसिक आदतें आज भी हमारे व्यवहार में दिखाई देती हैं। इसलिए समय-समय पर यह विचार करना आवश्यक है कि हम अपनी भाषा, परंपरा और संस्कृति के प्रति कितने सजग हैं।
सम्मान देना आवश्यक है, परंतु यदि वही सम्मान अपनी सभ्यता और अपने शब्दों में व्यक्त हो, तो उसका प्रभाव और भी गहरा और स्वाभिमानपूर्ण होता है। यही विचार हमें अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को पुनः समझने और अपनाने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष :हमें सबसे पहले अंग्रेजी या किसी भी भाषा से आए उस शब्द का उपयोग नहीं करना चाहिए, जिसका हमें अर्थ पता ही नहीं हो। हर समाज में दो तरह के लोग निवास करते हैं। एक शिक्षित वर्ग और एक अशिक्षित वर्ग होता है। शिक्षित वर्ग का यह दायित्व बनता है कि वह जिस शब्द का अर्थ नहीं जानें उसका उपयोग नहीं करें। क्योंकि शिक्षित वर्ग जो करता है, अशिक्षित वर्ग उसे देखकर उसकी ही नकल करता है। इसी के चलते कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है और शिक्षित वर्ग का यह भी दायित्व बनता है कि जो अशिक्षित हैं और इन शब्दों के बारे में जानते भी नहीं हैं, उन्हें ऐसे शब्दों का अर्थ भी समझाएं जिससे समाज और भाषा में फैली अश्लीलता को दूर किया जा सके।
✍️ साभार
🔏 लेखक : पंकज सनातनी
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