भारत में एक यूनिवर्सिटी में कथित स्टूडेंट्स द्वारा ऐसे नारे लगना देश के लिए सम्मानजनक है या शर्मनाक इसपर विचार जरूरी है। क्या JNU में वाकई लोग पढ़ने जाते है या कुछ लोगों के इशारों पर राजनीतिक एजेंडे चलाने? किसी देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की कब्र खोदने की इतनी खुली बातें करने के बाद भी क्या ये कहा जा सकता है को यहां आजादी नहीं है..?
ये नारे केवल 2 व्यक्तियों के लिए नहीं अपितु 2 संवैधानिक पदों पर बैठे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए बोले जा रहे है... क्या ऐसे नारे लगाने वालों के लिए कोई सजा नहीं? क्या ऐसे ही नारे आम जनमानस किसी भी नेता आदि के लिए लगा सकता है? Adv अनिल मिश्रा ने भी तो एक फोटो हो जलाई थी फिर उनपर एक्शन क्यों? और इन जाहिलो को इतनी आजादी क्यों?

