हम भगवान शंकराचार्य के विरुद्ध नहीं और इतनी हमारी क्षमता भी नहीं के हम भगवान शंकराचार्य के विरुद्ध बोल, लिख या सोच भी सकें लेकिन हम उस व्यक्ति के लिए बोल रहे है जो ऐसे गड़बड़ियां कर रहे हैं👇
√पहला तथ्य :
पुल नंबर 9, जिसे आपातकालीन परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से रिज़र्व रखा गया था, उसे उनके शिष्यों ने जबरन खुलवाया। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों से बदतमीज़ी हुई और देखते ही देखते भीड़ दौड़ने लगी।
अब ज़रा सोचिए—अगर उसी समय कोई बड़ा हादसा हो जाता, तो बचाव कार्य कैसे होता? आपातकालीन पुल को इस तरह खोलना सीधी-सी बात है: जन-सुरक्षा से खिलवाड़।
√दूसरा तथ्य :
किसी भी संत को पालकी में बैठकर संगम स्नान की अनुमति नहीं थी। फिर भी अविमुक्तेश्वरानंद को आगे जाने दिया गया—बस इतनी-सी रिक्वेस्ट थी कि 50 मीटर पहले पालकी से उतरकर पैदल चल लें।
लेकिन ज़िद यह थी कि पालकी सीधे संगम तक जाएगी।
अगर इसी ज़िद के कारण भगदड़ मचती, तो उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेता?
√तीसरा तथ्य :
हज़ारों साधु-संत वहाँ मौजूद थे, किसी ने अव्यवस्था नहीं फैलाई। अव्यवस्था की कोशिश सिर्फ एक गुट ने की। आरोप यह है कि यह सब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के इशारों पर किया गया, ताकि भीड़ भड़के और राजनीतिक फायदा उठाया जा सके—भले ही उसमें आम हिंदू कुचले जाएँ।
√सीधी बात :
अगर राजनीति करनी है, तो खुलकर कीजिए। आपने बिहार में पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा, उम्मीदवार खड़े किए—लेकिन नतीजा सबके सामने है।
तो साधु का चोला पहनकर, भीड़ के बीच अराजकता फैलाकर राजनीति करना बंद कीजिए। मैदान में आइए, चुनाव लड़िए—जैसा और लोग करते हैं।
√सबसे बड़ा विरोधाभास :
जब अखिलेश यादव के कार्यकाल में लाठियाँ पड़ी थीं, तब वही आज ‘संत अपमान’ की दुहाई दे रहे हैं।
हकीकत यह है कि इस बार कमिश्नर, डीएम, एसएसपी—सबने हाथ जोड़कर, बार-बार अनुरोध करके बात की। कोई बल प्रयोग नहीं, कोई अपमान नहीं—सिर्फ व्यवस्था और सुरक्षा की चिंता।
√निष्कर्ष :
आस्था का सम्मान ज़रूरी है, लेकिन ज़िद के नाम पर अराजकता और राजनीति के नाम पर जन-जोखिम किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं।
संत वही महान होता है, जो भीड़ को शांत करे—न कि उसे भगदड़ की ओर धकेले।

