कभी-कभी हम जिस सत्य को अपनी बुद्धि से तौलते हैं, वही सत्य जब भक्ति के सामने आता है तो हमें झुका देता है।
भक्ति प्रश्न नहीं करती… भक्ति समर्पण करती है।
ऐसी ही एक अद्भुत और हृदय को कंपा देने वाली कथा है महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी की।
एक बार किसी ने तुलसीदास जी से कहा कि नीलाचल, श्रीजगन्नाथ पुरी में स्वयं भगवान साक्षात् दर्शन देते हैं।
यह सुनते ही तुलसीदास जी का हृदय आनंद से भर गया।
मन में विचार आया — यदि प्रभु स्वयं दर्शन देते हैं, तो उनके चरणों में शीश रखने का सौभाग्य मुझे भी मिलना चाहिए।
अपने इष्ट श्रीराम के दर्शन की अभिलाषा लेकर वे श्रीजगन्नाथ पुरी की ओर चल पड़े।
महीनों की कठिन यात्रा…
थकान… भूख… प्यास…
पर हृदय में केवल एक ही भाव — प्रभु दर्शन।
जब वे पुरी पहुँचे और मंदिर में अपार भीड़ के बीच गर्भगृह में प्रवेश किया,तो जैसे ही उनकी दृष्टि श्रीजगन्नाथ जी पर पड़ी —
उनका हृदय ठिठक गया।
हस्तपादविहीन दारुमूर्ति… गोल नेत्र…
तुलसीदास जी के मन में एक टीस उठी।
यह मेरे इष्ट श्रीराम कैसे हो सकते हैं? मेरे राम तो सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं, करुणा की सजीव मूर्ति हैं…
मन भारी हो गया।दर्शन अधूरे लगे। दुखी हृदय लेकर वे मंदिर से बाहर निकले और एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।
मन में यही विचार चल रहा था —इतनी दूर आना व्यर्थ गया…
क्या यही मेरे राम हैं?नहीं… कदापि नहीं।
रात्रि गहरा गई, शरीर टूट रहा था, भूख-प्यास ने व्याकुल कर दिया था, आँखें बंद होने को थीं।
तभी अचानक किसी के पुकारने की आवाज़ आई —अरे बाबा… तुलसीदास कौन हैं?
एक बालक हाथ में थाली लिए खड़ा था।
तुलसीदास जी ने थकी हुई आवाज़ में कहा —हाँ भाई, मैं ही हूँ तुलसीदास।
बालक बोला —मैं आपको बहुत देर से खोज रहा हूँ। जगन्नाथ जी ने आपके लिए भात भेजा है।
तुलसीदास जी का हृदय और भी भारी हो गया। उन्होंने कहा —
भैया, इसे वापस ले जाओ। मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाए कुछ ग्रहण नहीं करता और यह प्रसाद मैं अपने इष्ट को समर्पित नहीं कर सकता।
बालक मुस्कराया और बोला —“बाबा, आपने तो सुना ही होगा
‘जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ।’ और यह स्वयं महाप्रभु ने भेजा है।”
तुलसीदास जी बोले -यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकती।
तभी उस बालक ने शांत स्वर में कहा —तो फिर आपने अपने रामचरितमानस में यह किसका वर्णन किया है—
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
यह सुनते ही तुलसीदास जी की देह काँप उठी।
नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।
मुख से शब्द नहीं निकल पा रहे थे।
बालक ने थाली भूमि पर रखी और कहा -मैं ही तुम्हारा राम हूँ।
मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है। विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना।
और यह कहकर वह बालक अदृश्य हो गया।
तुलसीदास जी की अवस्था ऐसी थी जैसे प्राण निकल आए हों।
रोम-रोम पुलकित था। नेत्रों से अश्रु अविरल बह रहे थे।
उन्होंने प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
प्रातः जब वे मंदिर में दर्शन हेतु गए,तो जहाँ जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा थे —वहाँ उन्हें साक्षात् श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी के दर्शन हुए।
भगवान ने भक्त की भावना को स्वीकार किया। रूप बदल गया… पर प्रभु वही रहे।
जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने वह रात्रि बिताई,वह आज तुलसी चौरा कहलाता है और उनकी पीठ बड़छता मठ के रूप में आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
यह कथा हमें सिखाती है —भगवान रूप में नहीं, भाव में बसते हैं।जहाँ सच्ची भक्ति है, वहीं राम हैं।

