हम शायद ऐसी आखिरी पीढ़ी है जिसे कुछ हद तक अपनी और अपने पूर्वजों की तथा अपने गोत्र की जानकारी है लेकिन क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं कि हम यह जानकारियां अपनी अगली वीडियो तक भी पहुंचाएं?? पूरा आर्टिकल ध्यान से पढ़िए और अपना कर्तव्य निभाइये
जहां पर भी हम किसी से कहीं पर मिलते हैं तो अक्सर हमसे बात करने वाला शख्स कभी ना कभी तो पूछता ही है कि आपके सरनेम का क्या मतलब है? पूजा करते समय पंडितजी तो संकल्प में अवश्य ही हमें हमारा गोत्र पूछते हैं तो हम बगले झांकने लगते हैं, मतलब हम स्वयं ये नहीं जानते कि हमारी जङें कहां पर है, हमारी जाति का इतिहास क्या है, हमारा वेद कौन सा है, हमारी शाखा कौनसी है हमारा नख शिख प्रवर क्या है। मतलब हम कौन हैं यह हमें वास्तव में पता ही नहीं है, अगर ईमानदारी से विश्लेषण करें तो इससे बड़ी शर्म की बात शायद ही दूसरी कोई हो सकती है।
हम अपने बच्चों को 3 साल में A B C D सिखा देते हैं। 5 साल में टेबलेट पकड़ा देते हैं। 15 साल में करियर काउंसलिंग। 20 साल में विदेश भेज देते हैं।
पर हमने कभी 10 मिनट निकाल कर उन्हें ये नहीं बताया कि -
"बेटा! तू फलां भारद्वाज गोत्र का है, मतलब तू उस ऋषि का वंशज है जिसने ब्रह्मास्त्र की खोज की थी। तेरी कुलदेवी फलां चामुंडा माता है, जो तेरे परदादा ने जोधपुर से कंधे पर बिठा कर लाई थी जब पूरा गांव सूखे में पलायन कर रहा था। हम मारवाड़ से उठे हैं, हमारा काम लोहा पीटना नहीं, इतिहास लिखना था। इस तरह की जङें सबकी हैं।
लेकिन
हम नहीं बताते, क्योंकि हमारे पास समय नहीं है, जबकि निश्चित रूप से हमारे वंश का कोई ना कोई गौरवशाली इतिहास जरूर रहा है। और यही हमारी सबसे बड़ी गलती है।
हम सोचते हैं कि पैसा, मकान, दुकान दे देंगे तो कर्तव्य पूरा। पर सच ये है कि एक दिन वो मकान बिक जाएगा, पैसा खत्म हो जाएगा, क्योंकि गरीबी अमीरी का उतार चढ़ाव हमारे वंश ने काफी बार देखा है। लेकिन किसी भी स्थिति में जो कभी नहीं बिकेगा, वो है - तेरा नाम किस महान ऋषि से जुड़ा है।
आज हर दूसरा बच्चा डिप्रेशन में है। क्यों? क्योंकि वो खुद को अकेला समझता है। उसे लगता है वो अकेला लड़ रहा है। अगर उसे पता हो कि उसके पीछे सैंकङों पीढ़ियां खड़ी हैं, लाखों पूर्वजों का आशीर्वाद है, कितनी ही पीढ़ियों का संघर्ष है, तो क्या वो टूटेगा? इतनी विपुल थातियों और संपदाओं से सुसज्जित वंश परंपरा के संवाहक होने का एहसास हमारे भीतर एक असीमित ऊर्जा भर देता है, जिसकी हमें सर्वाधिक आवश्यकता है।
गोत्र कोई अंधविश्वास नहीं है। ये DNA की पहली लैब रिपोर्ट है। हमारे ऋषियों ने 5000 साल पहले ही कह दिया था कि एक ही गोत्र में शादी मत करो, नहीं तो बच्चे कमजोर होंगे। आज साइंस उसी को जेनेटिक डिसऑर्डर कहता है।
कुलदेवी कोई पत्थर नहीं है। वो तुम्हारे परिवार की माँ है। जब तुम नई नौकरी पर जाते हो, तो माँ को फोन करते हो न? तो कुलदेवी को भूल गए तो किसे अपनी आस्था समर्पित करोगे? इसीलिए घर में सब है, पर शांति नहीं है। पूजा सब करते हैं, पर लगती नहीं है, क्योंकि अपनी माँ को छोड़कर दूसरे की माँ को पूज रहे हो।
हम आज इन चीजों पर विचार नहीं करते क्योंकि हमें लगता है ये पिछड़ेपन की बात है। जाति-गोत्र पूछना शर्म की बात है। अंग्रेजी में बात करना सभ्यता है।
पर सच उल्टा है। जो समाज अपनी जड़ भूल जाता है, वो ज्यादा दिन हरा नहीं रहता।
आज और अब भी समय है।
आज शाम जब बच्चा ट्यूशन से आए, तो 10 मिनट के लिए मोबाइल बंद कर दीजिए और पूछिए -
"बेटा, तुझे पता है तेरा गोत्र क्या है?"
वो कहेगा नहीं पता।
तो कहना - "चल आज मैं बताता हूँ, हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, हमारी कुलदेवी कौन है।"
विश्वास मानिए, उस 10 मिनट में जो संस्कार जाएगा, वो 10 साल की कोचिंग नहीं दे पाएगी।
वरना एक दिन ऐसा आएगा जब हमारे बच्चे गूगल पर सर्च करेंगे - "What is my Kuldevi?"
और गूगल जवाब नहीं देगा, क्योंकि गूगल के पास डेटा है, जड़ नहीं।
तो आज ही लिखिए।
एक कागज लीजिए। ऊपर अपने दादाजी का नाम, उनके दादाजी का नाम। नीचे गोत्र, कुलदेवी, मूल गांव। अपनी जाति की शाखा अपना मूलवेद, अपना नख शिख और अपना प्रवर इन सब को सुनिश्चित करने के बाद अपने पिता दादा परदादा और जितनी पीढियों का नाम आपको पता है इसका एक वंश वृक्ष बनाईये। फिर आपके वंश से जुड़े इतिहास का अन्वेषण कीजिए अपने वंश की सती झुंझार भोमिया देवली या मंदिरों का डाटा तैयार करके उन्हें सुरक्षित अंकित करवाइए।
और उसे घर के नोटिसेबल पॉइंट पर चिपका दीजिए।
ताकि आपका बच्चा रोज देखे कि वो अनाथ नहीं है, वो एक महान परंपरा का वारिस है।
हम आखिरी पीढ़ी न बनें, जो जानती तो थी, पर बताना भूल गई।🙏🚩🙏

