मेट्रो सिटी (महानगरों) में रह रहे जॉब वाले दम्पतियों के बच्चे कोई लेफ्टिस्ट बन रहे, कोई समलैंगिक बन रहे, कोई LGBT एक्टिविस्ट बन रहे… यह वो बच्चे हैं जो कॉलेज लाइफ़ में वोदका और चरस (चरस) का सेवन सीख चुके हैं… स्कूल बैग के अंदर वेप (ई सिगरेट) मिल रही है इनके… इन बच्चों का परिवार नामक संस्था में कोई विश्वास नहीं है… ना यह शादी करवाके परिवार बढ़ाएंगे,,, ना ही यह अपने बूढ़े मां बाप के पास रहेंगे… कॉलेज में ब्रेनवॉशड इन बच्चों की ही जिद्द और बदतमीजियो के कारण इनके मां बाप दूसरे रिश्तेदारों से भी कट चुके हैं… जब इनके बूढ़े मां बाप मरेंगे यह लेफ्टिस्ट संतानें उनका विधिवत संस्कार तक नहीं करेगी,, श्राद्ध तो दूर की बात।
बड़े शहरों में पैसा कमाने में व्यस्त दंपति ने ये बच्चे पैदा अवश्य किए हैं, पर यह काम आएंगे कम्युनिस्ट लॉबी के… यह ताउम्र सिंगल रह जाएंगे और आंदोलनजीवियों द्वारा जंतर मंतर या दिल्ली में रखे धरने प्रदर्शनों में जाने के काम आएंगे… बीमार पड़े मां बाप के नहीं… आज जो 55-60 के हो चले हैं उन्हें कोई पानी पिलाने वाला नहीं होगा…
ये जितने भी कम्युनिस्ट आज 60-70 वर्ष की उम्र वाले हैं इनके पारिवारिक बैकग्राउंड पता करवा लो, इनके मां बाप भी ऐसे ही अकेले कमरों में मर गए उन्हें देखने तक नहीं पहुंचे यह 65-70 वाले कम्युनिस्ट। वरिष्ठ एक्टर पीयूष मिश्रा खुद बताता है जब वह कम्युनिस्ट था उसके मां बाप बिना सेवा के तंगी में मर गए, तब जाकर उसके दिमाग से कम्युनिज्म और आंदोलनों का नशा उतरा।
किसी चालाक भेड़िये की तरह मुंह से मीठा बोलने वाले कम्युनिस्ट ईको सिस्टम के प्रोडक्ट योगेंद्र यादव… अपने बच्चों को विदेश भेजकर आपके बच्चों को आंदोलनजीवी और LGBT समलैंगिक बना रहा आज… उन्हें प्रेरित कर रहा के सदा सिंगल रहो और जंतर मंतर पर क्रांति करने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है।
90 के दशक में न्यूयॉर्क, सन फ्रांसिस्को, लॉस एंजल्स, शिकागो, वाशिंगटन भी ऐसी ही शापित हो गया था… आज इन चारों मेट्रो सिटी में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को LGBT/समलैंगिक बना दिया जाता है। ज़रा सोचो आपके पैदा किए बच्चे किसके काम आ रहे हैं? आपके या आंदोलन जीवियों के? …क्या 10 साल बाद भारत में आपके बच्चे भी ऐसे ही परिवार के बिना सिंगल/समलैंगिक होकर मर खप जाएंगे? आज की Zen G पीढ़ी जब बूढ़े होके मरेगी तब इनको खुद को आग लगाने वाला कोई नहीं बचेगा… भारतीय परिवार अब भी ना सुधरे तो अगले 10 साल बाद आपकी लाश (अर्थी) के पास रोने वाला कोई रिश्तेदार तक मौजूद नहीं होगा आपके पास।
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