जी हां, आपने सही सुना। दुनिया के सबसे बड़े संगठन UN ने तो औरतों को 'इंसान' मानने से ही इनकार कर दिया था। लेकिन फिर एंट्री हुई भारत की एक ऐसी बेटी की, जिसने रातों-रात दुनिया का सबसे बड़ा कानून बदलवा दिया।
यह कहानी शुरू होती है साल 1948 के पेरिस से, जहाँ दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के पुरुष एक कमरे में बैठकर पूरी इंसानियत की किस्मत लिख रहे थे।
मानवाधिकारों का मसौदा तैयार हो रहा था, तब बड़े-बड़े देशों के प्रतिनिधि लिख रहे थे- "All Men are born free and equal
(सभी पुरुष स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं)।
तभी कोने में बैठी एक भारतीय महिला की आवाज़ गूँजी "इसे बदलिए, वरना मैं साइन नहीं करूँगी!"
सब हैरान थे। सामने खड़ी थीं हंसा मेहता। अंग्रेजों और अमेरिकियों ने हंसते हुए कहा, "मैडम, 'Men' का मतलब इंसान ही तो होता है।" हंसा ने आंखों में आंखें डालकर जवाब दिया, "अगर 'Men' का मतलब इंसान होता है, तो कल आप कहेंगे कि महिलाएं इंसान नहीं हैं, इसलिए उन्हें अधिकार भी नहीं मिलेंगे। यहाँ 'Human Beings' लिखिए।"
महीनों बहस चली, पूरी दुनिया का दबाव था, लेकिन वो भारतीय महिला नहीं झुकी। अंत में पूरी दुनिया को हार माननी पड़ी और इतिहास का सबसे बड़ा दस्तावेज बदला गया। आज पूरी दुनिया की औरतें जो हक पा रही हैं, वो उस दिन हंसा की उस एक 'ज़िद' की वजह से मुमकिन हुआ।
अब कहानी को थोड़ा पीछे ले चलते हैं -
14 अगस्त 1947 की रात। दिल्ली में बारिश हो रही थी, नेहरू जी अपना प्रसिद्ध भाषण देने वाले थे। लेकिन उस मंच पर एक और बड़ा काम होने वाला था।
सबकी नजरें एक महिला पर थीं जो खादी की साड़ी पहने, हाथ में कुछ दबाए मंच की ओर बढ़ रही थी। वो हंसा मेहता थीं। उन्होंने आज़ाद भारत का पहला आधिकारिक तिरंगा अपने हाथों में थाम रखा था। नेहरू जी को झंडा सौंपते हुए उन्होंने कहा था, "यह झंडा देश की उन करोड़ों महिलाओं का है जिन्होंने आज़ादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।"
हंसा सिर्फ कागजों पर शेरनी नहीं थीं, असल ज़िंदगी में भी बागी थीं।
हंसा का दिमाग इतना तेज़ था कि एक तरफ वो भारत का संविधान लिख रही थीं, और दूसरी तरफ फुर्सत मिलने पर शेक्सपियर के नाटकों का गुजराती में अनुवाद कर रही थीं। वो चाहती थीं कि गाँव का बच्चा भी विश्व साहित्य को अपनी भाषा में समझे।
हंसा मेहता का जीवन हमें सिखाता है कि क्रांति सिर्फ बंदूकों से नहीं आती, कभी-कभी क्रांति एक सही 'शब्द' के चुनाव और सही जगह पर 'अड़' जाने से भी आती है।
Knowledgeadda Adda के दर्शकों, क्या आपने कभी सोचा था कि संयुक्त राष्ट्र (UN) की शब्दावली बदलने के पीछे एक भारतीय महिला का दिमाग था?
हंसा मेहता वो नाम है जिसे इतिहास की किताबों ने शायद वो जगह नहीं दी जिसकी वो हकदार थीं। वे सिर्फ एक नेता नहीं, एक 'बौद्धिक क्रांतिकारी' थीं।
आपको क्या लगता है? क्या हमें स्कूल की किताबों में हंसा मेहता जैसी वीरांगनाओं के बारे में और ज़्यादा पढ़ाया जाना चाहिए?
सोचिए ये हंसा मेहता की जगह कोई शबाना होती..???? शायद अब तक न सिर्फ नोबेल मिल गया होता बल्कि,...अपने यहां विपक्षी द्वारा गांधी आंबेडकर की तरह पूजी जाती

