वापी से लेकर मुम्बई तक और मुम्बई के आसपास की करीब करीब 40 किलोमीटर की परिधि पर यदि गौर किया जाए तो 3 प्रकार की चाय की दुकान दिखती है,
जिन्हें इनके बोर्ड से ही पहचाना जा सकता है।
●KGN नागौरी या ईरानी टी स्टाल,
●भट्ट टी स्टाल,
●यादव/पांडेय/त्रिपाठी टी स्टाल।
जैसा कि नाम से समझ आ रहा है कि KGN नागौरी टी स्टाल राजस्थान, नागौर के मुस्लिमों द्वारा संचालित है,
भट्ट टी स्टाल गुजरात के पेशेवर भट्ट (ब्रहामण हलवाई व रसोईये) द्वारा संचालित हैं..
और तीसरी यूपी व बिहार के लोगो द्वारा संचालित हैं।
अब बात यदि प्रतिशत की करें तो KGN नागौरी टी स्टॉल्स का प्रतिशत लगभग 70+ है,
जबकि भट्ट टी स्टॉल्स 20 व बाकी बचे 10 प्रतिशत।
मुम्बई में चाय की दुकानें दूध के 3 स्तरीय व्यापार का एक हिस्सा हैं,
खालिस दूध बेचने वाले हिस्से में यादव/पांडेय/त्रिपाठी आदि का हिस्सा 60 प्रतिशत है जबकि 40 प्रतिशत हिस्सा नागौरियों का है।
और दूध उत्पादन के काम में 90 प्रतिशत हिस्सा नागौरियों का है और बचे 10 प्रतिशत में सब हैं।
पहले यह स्थिति नही थी,
इस व्यापार में मुस्लिमों की उपस्थिति नगण्य या थी ही नही, लेकिन बताने वालों के अनुसार पिछले 30 से 40 वर्षों में स्थिति पूरी तरह से बदल गई है,
और बदलती ही जा रही है।
स्थिति का बहुआयामी विश्लेषण करने पर समझ आता है कि सामूहिक स्तर पर हिन्दुओं ने बडी रणनीतिक चूक कर दी,
व्यापार बिना लाभ के होता नहीं है लेकिन व्यापार करने के कुछ अघोषित नियम होते हैं,
जिसमें सहृदयता, उत्पाद की विश्वसनीयता व जोखिम लेने की क्षमता आदि प्रमुख हैं।
सबसे पहले गौर करते हैं मुम्बई में दूध उत्पादकता पर,
पहले यह कार्य पांडेय व यादव लोगों के हाथ में था,
समस्या तब हुई कि जब दूध उत्पादकों ने 1 लीटर दूध व 1 लीटर पानी मिलाकर 2 लीटर दूध सप्लाई करना आरम्भ कर दिया।
जो दुग्ध विक्रेता इस 2 लीटर दूध को लेता था वे आगे अपने स्तर पर फिर 1 लीटर में आधा लीटर पानी मिलाकर ग्राहक को शुद्ध दूध के नाम पर बेचता था।
ऊपर से ग्राहकों के साथ खड़ा व बड़बोला व्यवहार ऐसा कि जैसे उस पर उपकार व अहसान किया जा रहा हो,
कुल मिलाकर ग्राहकों का हर प्रकार से खून चूसा जाने लगा परिणाम यह हुआ कि ग्राहक व विक्रेता के बीच खाई बढ़ती गई।
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स्थिति को अनुकूल देखकर आरंभ में नागौर के 5 मुस्लिम परिवारों ने दूध उत्पादन में हाथ डाला,
इन्होंने बड़े ही धैर्य से वे गलतियाँ नहीं दोहराईं जो हिन्दुओं ने की थी।
दूध उत्पादकता में उतरे नागौर के इन 5 परिवारों ने अपना दूध 1 रुपया लीटर महँगा सप्लाई किया लेकिन अपने दूध में एक भी बूँद पानी नही मिलाया,
अपना व्यवहार सहृदय रखा साथ ही अपनी जुबान भी मीठी रखी।
इन्होंने एक काम यह भी किया कि अपने नाते रिश्तेदारों व जानकारों को चाय के व्यापार में उतारा,
चाय के व्यापार के लिए कुछ अघोषित नियम बनाए, जैसे कि चाय खालिस दूध की ही बेची जाएगी और चाय बनाने में अदरक व तुलसी समेत अन्य मसालों का उपयोग होगा जिसके लिए एक पैसा अधिक नहीं लिया जाएगा।
हुआ यह कि वे नखरेबाज व ऊँची नाक वाले गुजराती भट्ट चाय विक्रेता सबसे पहले चाय के व्यापार से बाहर हुए...
उसके बाद यूपी बिहार के पंडित व यदुवंशी भैया लोग बाहर हुए।
इस व्यापार का एक अघोषित नियम यह था कि चाय वाला दूध नही बेचेगा...
लेकिन नागौरियों ने चाय की ही दुकान से शुद्ध दूध व आर्डर पर घी भी बेचना आरम्भ करवा दिया।
लगे हाथ नागौरियों ने चाय की दुकानों पर बेचे जाने वाले सहउत्पाद जैसे कि बिस्किट, खारी, टोस्ट, मिल्ककेक आदि के लिए भी अपने लोगो को उतारा और उन्हीं का सामान अपनी दुकानों से बेचा,
यहाँ तक कि नागौरी जल मुम्बई में आज 100+ करोड़ का ब्रांड बन गया है,
यहाँ तक कि प्लास्टिक या कार्डबोर्ड के गिलास भी नागौरी मुस्लिम बनाने लगे।
कुल मिलाकर 30 या 40 वर्ष पूर्व 5 नागौरी मुस्लिम परिवारों द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चल कर आज मुम्बई में 90% दूध उत्पादन, 70% चाय की दुकानें व 40% दूध का वितरण आज नागौर के मुस्लिमो के हाथ में है, इसके साथ साथ इनके हाथों में सैकड़ो की संख्या में बेकरी, मिल्ककेक व पानी पैक करने वाली इकाइयाँ भी हैं।
इनकी हजारों की सँख्या हर स्तर की BC (चिटफंड) चलती हैं जो इन्हें निर्बाध धन मुहैया कराती रहती हैं।
यदि नागौर या आसपास के किसी बन्दे के पास मुम्बई में चाय या दूध के व्यापार के लिए पूँजी की कमी है तो अन्य नागौरी की जुबान पर उसे पूँजी भी मुहैया करा दी जाती हैं।
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हिन्दुओं के हाथों से हमेशा की तरह उनका जमा जमाया व्यापार निकल गया लेकिन ये सुधरे नहीं।

