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आज के हिंदू समाज की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए, यह सवाल अब कड़वा जरूर है पर पूछना जरूरी हो गया है।
आज हिंदू समाज एक अजीब दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ हमारे मंदिरों, आश्रमों और चौराहों पर विशाल भंडारे लगते हैं, लाखों-करोड़ों का अन्न, घी, तेल और पैसा पुण्य कमाने के नाम पर बहा दिया जाता है।
दूसरी तरफ वही हिंदू समाज के सैकड़ों युवा, जो धर्म, संस्कृति और मंदिरों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरते हैं, सोशल मीडिया पर बोलते हैं, या किसी विवाद में फँस जाते हैं, वे महीनों-सालों तक जेलों में बंद रहते हैं।
उनके परिवार कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते बर्बाद हो जाते हैं, जमानत के लिए बीस-तीस हजार रुपये तक नहीं जुटा पाते। हमारा पुण्य आखिर किस काम का, अगर हमारे अपने योद्धा जेल में अकेले लड़ रहे हों।
पिछले सत्तर सालों में हिंदू समाज को एक सुविधाजनक मानसिकता में ढाल दिया गया है कि दान दो, भंडारा कराओ, प्रसाद बाँटो, पुण्य कमाओ और घर जाओ। अन्नदान महादान है, पर जब समाज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हो तब प्राथमिकताएँ बदलनी पड़ती हैं।
आज स्थिति यह है कि हर सोमवार, मंगलवार, पूर्णिमा, अमावस्या पर लाखों रुपये के भंडारे हो जाते हैं, बड़े-बड़े कथावाचकों के पंडालों में पचास लाख से पाँच करोड़ तक एक सप्ताह में खर्च हो जाता है, श्रोता भाव-विभोर होकर लौटते हैं।
पर अगले ही दिन जब कोई हिंदू युवा बोलने पर या धार्मिक जुलूस में शामिल होने पर मुकदमे में बंद कर दिया जाता है तो वही समाज मौन हो जाता है। हमने पुण्य को इवेंट बना दिया है और धर्म-रक्षा को किसी और की जिम्मेदारी।
युद्ध के समय लंगर जरूरी है, पर सैनिकों को सुरक्षा देना उससे भी ज्यादा जरूरी है। देश में आज सैकड़ों हिंदू संगठन काम कर रहे हैं, इनका काम जागरूकता फैलाना, आंदोलन करना, ज्ञापन देना तक सीमित रह गया है।
जब बात कानूनी लड़ाई की आती है तो नब्बे प्रतिशत संगठन पीछे हट जाते हैं, कारण साफ है कि कानूनी लड़ाई लंबी, महंगी और थकाने वाली है। एक जमानत कराने में पंद्रह हजार से एक लाख तक लग जाता है, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट तक केस ले जाने में दस-बीस लाख लग जाते हैं।
संगठनों के पास न तो समर्पित लीगल सेल है, न ही लीगल डिफेंस फंड। नतीजा यह है कि युवा जोश में आकर केस खा जाता है, दो साल जेल काटता है, बाहर आता है तो करियर खत्म, परिवार टूटा हुआ, और संगठन अगले मुद्दे पर व्यस्त।
इससे नए लड़कों में संदेश जाता है कि धर्म के लिए लड़ोगे तो कोई बचाने नहीं आएगा, और यह डर सबसे खतरनाक है क्योंकि यह समाज को कमजोर बनाता है। कथा-भागवत सनातन की आत्मा है, कथावाचक समाज के मार्गदर्शक हैं, लाखों-करोड़ों लोग उन्हें सुनते हैं, मानते हैं।
पर चिंता का विषय यह है कि अधिकांश कथाओं का फोकस केवल मोक्ष, भक्ति, परिवार और व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रह गया है, सामाजिक धर्म यानी समाज की रक्षा का धर्म कथा के पंडाल से दूर हो गया है।
जब मंच से यह कहा जाए कि इस कथा की दक्षिणा का दस प्रतिशत हम धर्म के लिए केस लड़ रहे युवाओं के लीगल फंड में देंगे, तो सोचिए समाज में क्या संदेश जाएगा। जब एक करोड़ की कथा में से दस लाख रुपये पचास युवाओं की जमानत बन जाएँ, तो वह दस लाख, एक करोड़ के भंडारे से बड़ा पुण्य होगा, क्योंकि आपने अन्न नहीं, एक पूरा भविष्य बचाया है।
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कथा को केवल रुलाने-हँसाने का माध्यम न बनाकर जगाने का माध्यम बनाना होगा, क्योंकि अगर श्रोता ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो कथा सुनेगा कौन। इस तुलना का मकसद भंडारे का विरोध नहीं है, अन्नदान बंद नहीं होना चाहिए, पर विवेक-दान शुरू होना चाहिए।
अब जरा दूसरे पक्ष की कार्यशैली देखिए, क्योंकि अपनी रणनीति तय करने से पहले दूसरों की व्यवस्था समझना जरूरी होता है। कई पथों और समुदायों में भंडारा जैसी सामूहिक अन्न-सेवा की परंपरा प्राथमिकता में नहीं है, उनकी प्राथमिकता है अपने लोगों को कानूनी-आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा देना।
उनका सिद्धांत सीधा है कि अगर हमारी विचारधारा के लिए कोई व्यक्ति जेल जाता है, मुकदमे में फँसता है, तो समुदाय की जिम्मेदारी है कि उसका घर चले, केस लड़े, बच्चे पढ़ें और जमानत हो।
इस काम के लिए उनके यहाँ कई व्यवस्थित संगठन दशकों से काम कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया शिक्षा, यूपीएससी कोचिंग, छात्रवृत्ति और कानूनी सहायता के क्षेत्र में सक्रिय रहा है, और कई मामलों में मुकदमे में फँसे लोगों को कानूनी मदद उपलब्ध कराने का दावा करता है।
इसके अलावा स्थानीय स्तर पर मस्जिद कमेटियाँ, बैतूल-माल यानी सामुदायिक कोष और कई चैरिटेबल ट्रस्ट ऐसे बनाए गए हैं जो गिरफ्तारी के चौबीस घंटे के अंदर वकीलों की टीम खड़ी कर देते हैं, हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पैरवी कराते हैं, और पैसा सामूहिक सहयोग से जुटाया जाता है।
जब तक व्यक्ति जेल में है, उसके घर का राशन, बच्चों की फीस, बिजली बिल, इलाज सब सामुदायिक सहयोग से चलता है, परिवार को सम्मान मिलता है। जेल से छूटकर आने वाले को हौसला दिया जाता है, रोजगार में समुदाय मदद करता है, इससे अगले सौ लोगों में डर खत्म होता है कि मेरे बाद मेरे घर को देखने वाले हैं।
इसी तरह ईसाई समुदाय में भी धर्मांतरण और सामाजिक कार्यों के लिए एक मजबूत संस्थागत ढांचा मौजूद है। कैथोलिक चर्च की 'कारितास इंडिया', 'कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया' और कई प्रोटेस्टेंट मिशनरी संगठन शिक्षा, अस्पताल, कानूनी सहायता और राहत कार्यों के लिए बड़े स्तर पर फंडिंग करते हैं।
जब कोई व्यक्ति उनके मिशनरी काम में जुड़ता है या किसी कानूनी विवाद में फँसता है, तो 'एडवोकेट्स फॉर क्रिश्चियन राइट्स', 'अलायंस डिफेंडिंग फ्रीडम इंडिया' जैसी लीगल संस्थाएँ मुफ्त कानूनी मदद देती हैं। नए धर्मांतरित परिवारों को आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई, नौकरी में प्लेसमेंट और कई बार विदेशी चर्चों से जुड़े एनजीओ के माध्यम से लगातार सहयोग मिलता है।
उनके यहाँ 'स्पॉन्सरशिप मॉडल' चलता है जहाँ यूरोप-अमेरिका की चर्चें भारत के किसी क्षेत्र या परिवार को सीधे गोद लेकर सालों तक आर्थिक मदद भेजती हैं। नतीजा यह है कि उनके यहाँ विचारधारा के लिए आगे आने का डर कम हो गया है, क्योंकि सिस्टम पीछे खड़ा है।
अब हिंदू समाज को देखिए, हमारे यहाँ नब्बे प्रतिशत ऊर्जा और पैसा भंडारे, मूर्ति, झाँकी, डीजे, कथा-पंडाल और प्रसाद में लगता है, जबकि उनके यहाँ ध्यान लीगल डिफेंस फंड, परिवार का भरण-पोषण, जेल से छूटे व्यक्ति का पुनर्वास और अगली पीढ़ी को तैयार करने पर रहता है।
हमने धर्म को इवेंट मैनेजमेंट बना दिया है, एक दिन की भीड़, एक दिन का प्रसाद, एक दिन की फोटो। उनके यहाँ धर्म इकोसिस्टम मैनेजमेंट है, आदमी गया तो परिवार सँभालेंगे, केस चला तो वकील देंगे, बच्चों को पढ़ाएँगे।
इसीलिए उनके यहाँ अठारह साल का लड़का भी आगे आने से नहीं हिचकता, और हमारे यहाँ तीस साल का व्यक्ति भी पोस्ट साझा करने से पहले दस बार सोचता है कि कहीं केस न हो जाए, घरवाले कौन देखेगा।
समस्या सिर्फ आम हिंदू की नहीं है, हमारे मार्गदर्शक भी इस इवेंट कल्चर के शिकार हैं। सात दिन की कथा में करोड़ों खर्च होते हैं, मंच से धर्मो रक्षति रक्षितः तो बोला जाता है, पर मंच के नीचे धर्म की रक्षा करते हुए जेल गया युवा अकेला लड़ता है।
अगर हर कथा में गुरु-दक्षिणा का दस प्रतिशत एक धर्मवीर लीगल फंड में अनिवार्य कर दिया जाए तो एक साल में हजार युवाओं की जमानत हो सकती है। सदस्यता के सौ रुपये लेने वाले संगठन, केस लड़ने के लिए दस हजार नहीं दे पाते।
बड़े मंदिरों में अरबों का चढ़ावा आता है, उसमें से एक प्रतिशत भी अगर धर्म रक्षा विधि कोष में चला जाए तो किसी हिंदू युवा के माँ-बाप को अपनी जमीन नहीं बेचनी पड़ेगी। हम दान करते हैं, पर टार्गेटेड दान नहीं करते, वे सहयोग करते हैं पर टार्गेटेड सहयोग करते हैं — केस, परिवार, जमानत, वकील, शिक्षा, रोजगार।
यह तुलना किसी से द्वेष के लिए नहीं, अपनी नींद तोड़ने के लिए है। इतिहास का नियम है कि जो समाज अपने सिपाहियों को अकेला छोड़ देता है, वो समाज खुद कमजोर हो जाता है।
इसलिए हिंदू समाज को आज चार काम तुरंत करने होंगे। पहला, भंडारा बजट का पच्चीस प्रतिशत नियम बनाना होगा कि जो भी भंडारा, कथा, जागरण हो उसके कुल खर्च का एक-चौथाई हिस्सा जिले के हिंदू लीगल डिफेंस फंड में जाए, और ये पैसा सिर्फ जमानत, वकील और परिवार के भरण-पोषण में लगे।
दूसरा, धर्मवीर सम्मान परंपरा शुरू करनी होगी कि जो भी युवा धर्म के लिए केस लड़कर बाहर आए, मंदिर समिति और समाज उसे मंच पर बुलाकर सम्मानित करे, उसकी नौकरी-धंधे में मदद करे, ताकि जेल जाना कलंक नहीं सम्मान लगे।
तीसरा, हर मंदिर एक लीगल हेल्पडेस्क बने जहाँ बड़े मंदिरों में एक वकील सप्ताह में दो दिन मुफ्त सलाह दे, गिरफ्तारी होते ही परिवार को पता हो कहाँ जाना है।
चौथा, सोच बदलनी होगी और अपने बच्चों को सिखाना होगा कि सबसे बड़ा पुण्य अन्नदान नहीं, अभयदान है, यानी धर्म के लिए लड़ने वाले को भय से मुक्त करना।
भंडारे चलते रहेंगे अगर धर्म चलता रहा, अगर आज हम नहीं जागे तो कल न भंडारे के लिए मंदिर बचेंगे, न कथा के लिए श्रोता। क्योंकि धर्म बचेगा तो सब बचेगा, और धर्म बचाते हैं वो युवा जो केस, जेल, मुकदमे के डर से आज चुप हैं।
उनका डर खत्म करो, उनके पीछे खड़े हो जाओ, क्योंकि जिस दिन हिंदू समाज ने अपने सैनिक को अपना परिवार मान लिया, उस दिन आधी लड़ाई हम वैसे ही जीत जाएँगे।
💢 अब से हर हिंदू परिवार का 4-सूत्री नियम —
1. महीने की आय का 1% धर्मवीर लीगल फंड में।
2. साल में 1 दिन, केस लड़ रहे परिवार से मिलना।
3. बच्चों को सिखाना: केस = कलंक नहीं, धर्मसेवा है।
4. भंडारा करो, पर पहले जमानत कराओ।
भंडारा एक दिन का पुण्य है, जमानत सौ साल का धर्म है, चुनना आपको है। क्योंकि भीड़ से इतिहास नहीं बनता, भीड़ के पीछे खड़े सिस्टम से बनता है।
✍️ साभार
🔏 लेखक : पंकज सनातनी
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