हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई श्री प्रह्लाद मोदी ने एक साक्षात्कार में कहा है कि हम पाँच पीढ़ी पहले राजस्थान से गुजरात आए। हम क्षत्रिय थे, यहाँ आकर हमने तेल का व्यवसाय आरंभ किया।
यह एक छोटा-सा वाक्य है, लेकिन भारत की जाति व्यवस्था की वास्तविकता को समझने के लिए यह एक दस्तावेज की तरह है।
इस एक बयान से कई ऐतिहासिक सच्चाइयाँ उजागर होती हैं कि पेशा बदलना संभव था ।प्रह्लाद मोदी का बयान इसका जीता-जागता प्रमाण है। क्षत्रिय परिवार ने राजस्थान से गुजरात आकर तेल का व्यवसाय अपनाया ंयह पेशा परिवर्तन की जीवंत मिसाल है।
डाक्टर Tribhuwan Singh जी को लगातार पढ़ते रहिये ..
बहुत संक्षेप में
भारत में वर्णाश्रम धर्म था और है ।
उसकी विशेषता एक पंक्ति में देख लें.. सबके ऊपर केवल एक चौथाई का भार था ..
ब्रहमचारी के ऊपर गृहस्थी का भार नहीं था ..
संन्यासी के ऊपर भी गृहस्थी का भार नहीं था ..
ब्राह्मण के ऊपर कम से कम में निबाह करके विद्या बांटने का भार था तलवार लेकर लड़ने अथवा व्यापार करने और टैक्स भरने का नहीं ..
मोटर स्टार्ट करें और चलाना सीखे = ब्रह्मचर्य
मोटर दौड़ाए , वैभव स्थापित करें = गृहस्थ
ब्रेक लगाना शुरु करें , दायित्व कम करना शुरु करें = वानप्रस्थ
रुक जायें = संन्यास
अब डॉक्टर साहब किन बातों पर बल दे रहे हैं
“ जातियाँ फैमिली ट्री थीं, जो पीढ़ियों से किसी शिल्प या व्यवसाय में दक्ष हो गईं। इनके बीच आपसी सौहार्द और स्वायत्तता थी।
अंग्रेजों ने
सबसे पहले अर्थव्यवस्था तोड़ी।
फिर महामारियों के डर को सामाजिक बहिष्कार में बदला।
फिर उसे "धार्मिक परंपरा" का नाम दिया।
और अंत में जातियों को सूचीबद्ध करके विभाजन को कानूनी मान्यता दे दी।
सीख क्या मिलती है ?
जैसे कोरोना के समय बनी दूरी को हम परंपरा नहीं कहते। संसार में कोई कोराना को छुआछूत नहीं कह रहा है न ? जान बचाने के लिये ही वह सब था ।
वैसे ही 19वीं सदी की महामारियों के समय का डर भी "छुआछूत" की सनातन परंपरा नहीं हो सकता। इतिहास को समग्रता में पढ़ना होगा, टुकड़ों में नहीं।
क्या यह संयोग है कि जब भारत की अर्थव्यवस्था तबाह हुई (और विश्व GDP में हिस्सा 24% से गिरकर 1.8% हुआ)।
क्या यह संयोग जब करोड़ों बेरोजगार हुए, महामारियों ने तबाह किया।तब अचानक "छुआछूत" और "जातिवाद" को 3000 साल पुरानी परंपरा बता दिया गया?
महत्वपूर्ण तथ्य देखा जाये और आप लोग गूगल भी कर सकते हैं ..
टेवेरनिर (350 वर्ष पूर्व) लिखते हैं कि क्षत्रियों ने शिल्प और वाणिज्य अपनाया था , यानी पेशा बदलने की स्वतंत्रता थी।
और नरेंद्र मोदी के भाई स्वयम् कह रहे हैं कि वे लोग पाँच पीढ़ी पहले क्षत्रिय थे फिर गुजरात आकर तेल का व्यापार करने लगे ।
एम.ए. शेरिंग ने लिखा कि कोली या कोरी वैश राजपूतों के वंशज हैं, जो बुनकरी करते थे। आज वही समुदाय अनुसूचित जाति में आता है।
निष्कर्ष..
प्रह्लाद मोदी का बयान पुनः उद्धृत कर रहा हूँ
और सबसे बड़ी बात अगर पेशा बदला जा सकता था, तो 'अछूत' कैसे सनातन हो सकते हैं?
अगर क्षत्रिय तेल बेच सकते हैं, तो फिर किसी समुदाय को 'अछूत' कहकर अलग करने की परंपरा सदियों पुरानी कैसे हो सकती है?
और अन्त में “ सबसे महत्वपूर्ण कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति कोरी जाति से हैं। जो वैश राजपूत थे और बुनकरी करते थे।
आज वे SC हैं।
राष्ट्रपति होकर भी दलिट हैं। विडंबना..

