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हिंदू धर्म में दान-पुण्य पर विशेष जोर दिया गया है। शुभ काम हो या पूजा पाठ हिंदू धर्म में भंडारे का आयोजन किया जाता है। सनातन धर्म में कहा गया है कि भूखे को खाना खिलाने से बड़ा पुण्य कोई नहीं है। इसी पुण्य की प्राप्ति या फिर किसी मनोकामना की पूर्ति होने पर भगवान का धन्यवाद करते हुए भंडारे का आयोजन किया जाता है। सैकड़ों और हजारों की संख्या में लोग अन्न ग्रहण करने के लिए भंडारे में पहुंचते हैं।
कई लोग संपन्न होने के बावजूद भी स्वादिष्ठ खाने की चाहत में भंडारे में पहुंच जाते हैं। क्योंकि भंडारे के खाने का स्वाद ही अलग होता है। सनातन धर्म में ही नहीं बल्कि सिख धर्म में भी लंगर रखा जाता है। लंगर या भंडारे का खाना प्रसाद होता है। आप ने भी अपने जीवन में अक्सर चलते-फिलते भंडारा खाया ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर किसी को भंडारा नहीं खाना चाहिए। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से बताते हैं कि किन लोगों को भंडारा नहीं खाना चाहिए।
भंडारा केवल अन्न बांटने की रस्म नहीं है, यह "नर-सेवा नारायण-सेवा" का जीवंत रूप है।
शास्त्र पूछते हैं: क्या यह प्रसाद सबके लिए है या इसका कोई अधिकारी है…? स्कंद पुराण साफ कहता है— "दरिद्रान् भोजयेद् यस्तु स याति परमां गतिम्"। यानी जो दरिद्रों को भोजन कराता है, वही परम गति पाता है। मनुस्मृति भी यथाशक्ति भिक्षुक, असहाय और भूखे को भोजन देने की बात करती है। इससे स्पष्ट है कि भंडारे का पहला अधिकार उसका है जिसके पास एक वक्त का निवाला नहीं है।
शास्त्रों के अनुसार भंडारे को उन लोगों के लिए कराया जाता है, जो लोग एक वक्त का खाना नहीं खा पाते हैं। वहीं यदि कोई समर्थ व्यक्ति भंडारे में भोजन करता है, तो ऐसा माना जाता है कि उसने किसी गरीब व्यक्ति का हक मारा है। क्योंकि भंडारे का उद्देश्य उन लोगों का पेट भरना होता है जो गरीब हैं और जिन्हें एक वक्त का भोजन नहीं मिल पाता है।
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*चलिए अब तर्कों के आधार पर समझते हैं—*
भंडारा सीमित संसाधनों से होता है। यदि 100 थालियों का इंतजाम है और 100 भूखे खड़े हैं, तो एक संपन्न व्यक्ति की थाली का मतलब है किसी भूखे का निवाला छिन जाना। गीता 3.12 में श्रीकृष्ण जी चेताते हैं कि जो बिना यज्ञ किए भोगता है वह चोर है। भंडारा नर-यज्ञ है। इसमें बिना सेवा या दान दिए केवल स्वाद के लिए खाना स्तेय-दोष यानी चोरी के समान है।
शास्त्रों के अनुसार, भंडारे में किसी काबिल व्यक्ति के यहां भोजन करना किसी गरीब या जरूरतमंद का हिस्सा हड़पना समझा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए अशुभ साबित हो सकता है। यदि कोई समर्थ व्यक्ति भंडारे में जाकर भोजन करता है, तो वह पाप का भागी बनता है। इसीलिए सक्षम लोगों को भंडारे का भोजन खाने से बचना चाहिए।
सुदामा का प्रसंग याद कीजिए। मित्र कृष्ण के हिस्से का चना बालपन में खा लिया तो जीवन भर दरिद्रता भोगनी पड़ी। दंड इतना कठोर इसलिए था क्योंकि "पर-भाग्य हरण" सबसे बड़ा पाप है। समर्थ होकर भंडारे में खाना उसी चने को खाने जैसा है जो किसी और सुदामा के लिए बना था। जब भगवान कृष्ण के हिस्से के चने मित्र सुदामा ने खा लिए थे तो उनको गरीबी का जीवन जीना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने किसी और का हक मारा था। हालांकि उनकी ये गलती बालकपन में हुई थी, लेकिन तब भी उनको इसका बुरा फल भुगतना पड़ा था। इसी तरह से किसी अन्य मनुष्य के हिस्से का भोजन करना अपराध है, इससे पाप चढ़ता है। इसीलिए भूलकर भी ऐसी गलती न करें।
ब्रह्मवैवर्त पुराण तो यहां तक कहता है कि पराया अन्न, पराया धन भोगना इंद्र का वैभव भी हर लेता है। इसीलिए लोक में मान्यता है कि अकारण भंडारा खाने से लक्ष्मी रूठ जाती हैं और घर में अन्न-धन का अभाव शुरू हो जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, जो समर्थ व्यक्ति भंडारे में भोजन करता है उसके जीवन में समस्या शुरू हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के घर में अन्न का अभाव पड़ने लगता है। ऐसा भी माना जाता है कि किसी काबिल व्यक्ति के भंडारे में रखा अन्न खाने से मां लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं। इससे आपको आर्थिक तंगी आनी शुरू हो जाती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि संपन्न व्यक्ति कभी प्रसाद न ले। शास्त्र अपवाद भी बताते हैं। यदि आयोजक स्वयं आग्रह करे तो वह प्रसाद है, दान नहीं।
जगन्नाथ पुरी में राजा भी पंक्ति में महाप्रसाद लेता है। दूसरा, गुरुद्वारे की मर्यादा देखिए— "पहले सेवा, फिर पंगत"। आपने बर्तन उठाए, पानी पिलाया, सेवा की, फिर प्रसाद लिया तो आप यजमान हुए, याचक नहीं। तीसरा, आपदा या यात्रा में जब अन्य विकल्प न हो तो आपद्धर्म के तहत ग्रहण कर सकते हैं, पर मन में गुप्त-दान का संकल्प होना चाहिए।
यदि कभी मजबूरी में खाना पड़ ही जाए तो शास्त्र प्रायश्चित भी बताते हैं। अगर आपको मजबूरी में भंडारे का खाना ग्रहण करना पड़ रहा है तो आपको वहां पर दान-पुण्य किए बगैर नहीं आना चाहिए। अगर आपके पास पैसा उपलब्ध न हो तो आप वहां सेवा करें। गरीबों को खाना खिलाने में मदद करें और उनके बर्तनों को उठाकर सही जगह पर रखें। अपनी क्षमता के हिसाब से दान-पुण्य कर आप भी भंडारे में सहयोग करें, जिससे पुण्य फल मिलता है। भोजन के मूल्य से दोगुना धन उसी जगह दान कर दें। यह द्रव्य-शुद्धि है। एक घंटा सेवा कर दें— पत्तल उठाना, बूढ़ों को खिलाना। यह काय-शुद्धि है। और खाते समय भाव रखें कि "त्वदीयं वस्तु गोविंद तुभ्यमेव समर्पये"। यानी यह गोविंद का है, मेरा हक नहीं।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि आज भंडारे सेल्फी-पॉइंट बन गए हैं। महंगी गाड़ी से उतरकर स्वाद के लिए लाइन में लगना और असली जरूरतमंद को धक्का देकर आगे बढ़ जाना धर्म नहीं है। तुलसीदास जी ने लिखा है, "परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई"। दूसरे का हक मारने जैसा अधर्म दूसरा नहीं। भंडारा कराने वाले का पुण्य तभी पूरा होता है जब निवाला सही हाथों में पहुंचे। और खाने वाले का धर्म तभी बचता है जब वह अपना अधिकार जांच ले।
इसलिए अगली बार पंक्ति में खड़े हों तो खुद से तीन बातें पूछें। पहला, क्या मैं सच में भूखा हूं या सिर्फ जीभ का भूखा हूं। दूसरा, क्या मैं यहां कुछ देने आया हूं या सिर्फ लेने। तीसरा, क्या मेरी थाली से किसी असली भूखे का निवाला कम तो नहीं होगा। यदि आपका मन कहे कि मैं सेवा भी करूंगा, दान भी दूंगा, तो प्रसाद ग्रहण करें। वरना एक बार रुककर सोचें, क्योंकि किसी का हक मारकर मिला स्वाद जीवन का स्वाद बिगाड़ देता है।
✍️ साभार
लेखक : पंकज सनातनी
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