सबरीमाला के बारे में 2018 के निर्णय पर Review Petition पर 7 अप्रैल से 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है - सबरीमाला मंदिर की प्रथा को गलत कहने वाले 2018 के निर्णय देने वाले जज थे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, ए एम खानविलकर, आर एफ नरीमन, डी वाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा - निर्णय 4:1 का था और इंदु मल्होत्रा Dissenting Judge थी -
8 वर्ष के बाद पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई 7 अप्रैल को शुरू हुई है और 22 अप्रैल तक चलेगी लेकिन जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां आ रही है, उन्हें देख कर लगता है 2018 के निर्णय में कोई बदलाव नहीं होगा और संविधान फिर से हिंदुओं और उनकी प्रथाओं पर लागू किया जाएगा -
पहले ही दिन जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी महिला को माहवारी के 3 दिन तक अछूत माना जा सकता है उसके बाद नहीं - यानी मंदिर की प्रथा गलत है जिसके अनुसार 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है - अब कोई महिला मासिक धर्म के दौरान भी अगर मंदिर में चली जाए तो क्या मंदिर उनके प्रवेश से पहले जांच करता फिरेगा - केंद्र सरकार ने मंदिर की प्रथा का पुरजोर समर्थन किया है -
फिर अगले दिन कहा गया कि कोर्ट तय करेगा “किसी धर्म में क्या है अंधविश्वास” - यह याचिका हिंदू मंदिर के संदर्भ में सुनी जा रही है लेकिन इस बयान का मतलब यही निकलता है कि कोर्ट एक तरह मंदिर की प्रथा को “अंधविश्वास” मान कर चल रहा है और निर्णय करेगा कि क्या यह “अंधविश्वास” है - कोर्ट ने “किसी धर्म” कहते हुए यह नहीं कहा कि ईसाई, इस्लाम और अन्य धर्मों की प्रथाओं की भी समीक्षा करेगा -
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि “न्यायालय द्वारा किसी चीज़ को धर्म के अंधविश्वास के रूप में वर्गीकृत करना और फिर यह जांच करना कि क्या यह धर्म का अभिन्न अंग है, न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता - लेकिन जस्टिस अमानुल्लाह सहमत नहीं थे और उन्होंने कहा कि कोर्ट को तय करने का अधिकार कि यह अंधविश्वास है या नहीं - बस सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक गंभीर बात कही कि किसी भक्त ने याचिका दायर नहीं की - 2018 का निर्णय भी जब आया था तब भी याचिकाकर्ता किसी भक्त की या मंदिर की प्रथा से सहमति न रखने वाली महिला की नहीं थी -
उसके अगले दिन कोर्ट ने कहा मंदिरों-मठों में भेदभाव अच्छा नहीं है - आप केवल मंदिरों-मठों की बात क्यों कर रहे हैं - क्या किसी गैर हिंदू को जो मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता मंदिरों-मठों में जाने की अनुमति मिलनी चाहिए - किसी ईसाई या मुस्लिम को मंदिर में क्या मतलब है -
जस्टिस अमानुल्लाह को अच्छी तरह मालूम है कि मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है - वह क्या भेदभाव नहीं है ? मुस्लिमों में तो मुस्लिमों के अलग अलग वर्ग के लोगों के लिए कब्रिस्तान भी अलग होते हैं जबकि हिंदुओं का दाह संस्कार एक ही जगह होता है
सुप्रीम कोर्ट ने सईद वसीम रिजवी की कुरान की 26 आयतों के खिलाफ दायर याचिका ख़ारिज कर दी थी और उस पर 50 हजार का जुर्माना भी लगा दिया था - याचिका सुनने की जरूरत भी नहीं समझी - अभी 4 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के ईसाई पादरी Vineet Vincent Pereira के खिलाफ आपराधिक मुक़दमे पर रोक लगा दी - वह अपने प्रवचनों में कहा करता था कि “There is only one religion which is Christian and Jesus is only God”
सबरीमाला तो कुछ वर्ग की महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित करता है लेकिन Pereira तो Christianity के अलावा सभी धर्मों को नाकारा कह दिया - यह अपने आप में एक Hate Speech है लेकिन आपने उसके खिलाफ केस ही रोक दिया - यह होता है भेदभाव -
बेहतर होगा अबकी सबरीमाला पर निर्णय सर्वसम्मति से हो जो शायद नहीं होगा
साभार
(सुभाष चन्द्र)
“मैं वंशज श्री राम का)

