महर्षि याज्ञवल्क्य की जयंती मुख्य रूप से फाल्गुन शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। वे शुक्ल यजुर्वेद के प्रवर्तक, महान दार्शनिक और 'याज्ञवल्क्य स्मृति' के रचयिता थे।
मौजूदा हिन्दू कानूनों का एक बड़ा हिस्सा जिस याज्ञवल्क्य स्मृति से आता है, वो याज्ञवल्क्य भी मिथिलांचल के ही थे लेकिन बिहार की बात होती है तो कोई उनका नाम लेता नहीं दिखता !!
ज्यादातर ऋषि दृष्टा हुए वेदों के,
किंतु वेदों पर, सबसे अधिक कार्य तीन महाशक्तियों ने किया। याज्ञवल्क्य, द्वैपायन, और रावण।
याज्ञवल्क्य क्रांतिकारी ऋषि हुए, जिन्होंने परंपरा से चले आ रहे यजुर्वेद को, अपने गुरु को वापस लौटाकर, शुक्ल यजुर्वेद प्रस्तुत किया। जो वापस लौटा दिया वह हुआ कृष्ण यजुर्वेद।
द्वैपायन ने वेदों को सरलता से प्रस्तुत करने के लिए विभाजन किया, एक वेद के चार वेद हुए, इसी लिए उन्हें वेदव्यास भी कहा गया।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत के जितने भी वर्तमान राजनीतिक दल हैं, वह अपनी प्रेरणा सौ डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हुए महापुरुषों से ही लेते हैं और बातें हिंदुत्व की कभी-कभी करते हैं ।
कोई गांधी जी का नाम लेता है ,कोई वीर सावरकर का, कोई नेता जी सुभाष का ,कोई डॉक्टर हेडगेवार, गुरु गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय का ।बस।
प्राचीन ऋषियों मुनियों महावीरों ,,महान विद्वानों, सम्राटों, वंदनीय धनियों, दानियों,निर्माण कर्ताओं, कलाकारों, मूर्तिकारों, पुरोहितों, लेखकों, कवियों ,श्रेष्ठ वीर नारियों, वीर पुरुषों, आदि का नित्य स्मरण इन दलों में नहीं होता।जबकि कम्युनिस्ट जैसे परम्परा द्रोही भी कम से कम 175 वर्ष पहले हुए मार्क्स का नित्य नाम जपते हैं।
दूसरी ओर मुसलमान 1400 वर्ष पुराने अपने पंथ प्रवर्तक की याद करते हैं और ईसाई अपने एक काल्पनिक पंथ प्रवर्तक की बात करते हैं जो कि ढाई सौ वर्ष बाद पहली बार प्रचारित होना शुरू हुए परंतु दोनों ही स्थितियों में यह दोनों समूह लगभग 1000 वर्ष से अधिक पुराने अपने महापुरुषों को याद करते हैं जबकि स्वयं को हिंदू कहने वाले सभी दल कुल मिलाकर 100 या 125 वर्ष पूर्व हुए अपने महापुरुषों की स्मृति तक अपने को नित्य केंद्रित रखते हैं और उन्हीं को मानो अपना नया पैगंबर या मसीहा या पंथ के प्रवर्तक जैसा बताते हैं।
ऐसे में स्वयं को हिंदू कहने वाले राजनीतिक समूहों की हार तो निश्चित ही है क्योंकि उसकी जड़ें डेढ़ सौ वर्ष से पहले कहीं नहीं है ,ऐसा वह मान कर चलता है ।
जो लोग भी स्वामी विवेकानंद ,श्री अरविंद, महात्मा गांधी, डॉक्टर हेडगेवार ,गुरु गोलवलकर ,दीनदयाल उपाध्याय आदि को ही वर्तमान भारतीय राजनीति के लिए एकमात्र पथ प्रदर्शक मानते हैं उनकी तो हार स्पष्ट है और सुनिश्चित है क्योंकि वे तो यह याद ही नहीं रखते कि वह करोड़ों वर्ष पुराने या लाखो वर्ष पुराने या कम से कम कई हजार वर्ष पुराने हिंदू समाज के प्रतिनिधि हैं।जबकि 150 वर्ष के भीतर हुए किसी महापुरुष के एक एक शब्द पर आग्रह करते हैं, उन्हें किसी धारा का एक प्रतिनिधि मात्र नहीं मानते।ऐसे समूह हिन्दू धर्म और समाज के प्रतिनिधि कैसे बन सकते हैं?वे तो बस अपने नए पंथ के प्रतिनिधि हैं।ऐसे लोग और पंथ कब तक टिक पाएंगे कहना कठिन है । खैर हम बात करते हैं ऋषि यज्ञवल्कय की -
याज्ञवल्क्य ;
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याज्ञवल्क्य एक युगप्रवर्तक आचार्य थे।
शुक्लयजुर्वेद-संहिता का संपादन किया।आरुणिउद्दालक इनके गुरु थे।यजु:शिष्यपरंपरा में वैशंपायन इनके गुरु थे, किन्तु उनसे इनका विवाद भी हुआ।
मृत्यु से मुक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है? मृत्यु के उपरान्त परलोक में क्या होता है?देव कितने हैं?सर्व-अन्तर्यामी आत्मा,प्राणब्रह्म,तत्वज्ञान,आत्मज्ञान आदि विषयों और प्रश्नों को लेकर अपने समय के अनेकानेक विद्वानों [अश्वल,जरत्कारव,भुज्युलाह्यायनि,उषस्तचाक्रायण,कहोल,गार्गी,विदग्धशाकल्य,सत्यकाम] से इनका शास्त्रार्थ हुआ था।
याज्ञवल्क्य ने जनक को बताया था कि मृत्यु के समय मनुष्य की प्रज्ञात्मा उसकी देहात्मा पर आरूढ होती है।
याज्ञवल्क्य ने बताया था कि>> मनुष्य का कर्म ही उसके साथ रहता है।
याज्ञवल्क्य ने जनक से स्पष्ट कहा कि > अननुच्य हरेत -दक्षिणां न गृह्णीयात।आत्मज्ञान का उपदेश दिये बिना किसी से दक्षिणा न लेनी चाहिये। साथ ही इसने यह भी कहा कि> मेरे पिताजी कहते थे कि > बिना दक्षिणा के आत्मज्ञान नहीं देना चाहिये।
याज्ञवल्क्य का मत था कि ऐहिक सुख का महत्व नैतिक- कल्याण से कम नहीं है।
इसके मत को सुखैकपुरुषार्थवाद भी कहा गया।
मिथिला में राजा जनक के राजऋषि रहे याज्ञवल्क्य ने 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह भी नहीं) का सिद्धांत दिया। उनके सम्मान में 'याज्ञवल्क्य महोत्सव' मनाया जाता है।
याज्ञवल्क्य जयंती के मुख्य पहलू:
तिथि: फाल्गुन शुक्ल पंचमी (उत्तर भारत में प्रचलित)। कुछ क्षेत्रों में यह कार्तिक शुक्ल द्वादशी को भी मनाई जाती है।
महत्व: महर्षि याज्ञवल्क्य को वैदिक ज्ञान का, विशेषकर शुक्ल यजुर्वेद का बहुत बड़ा ज्ञाता माना जाता है।
शिक्षा: वे सूर्यदेव के उपासक थे और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।
योगदान: उन्होंने 'शतपथ ब्राह्मण', 'बृहदारण्यक उपनिषद' और 'याज्ञवल्क्य स्मृति' (कानून और दर्शन) जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।
दर्शन: उन्होंने "नेति-नेति" का प्रसिद्ध सिद्धांत दिया, जो ब्रह्म की असीम प्रकृति को दर्शाता है।
निजी जीवन: उनके पिता देवरात थे और उनकी पत्नी मैत्रेयी एक विदुषी थी, जिनसे उनका ज्ञानपूर्ण संवाद प्रसिद्ध है।
याज्ञवल्क्य आश्रम बिहार के मधुबनी जिले के जगबन गाँव में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि याज्ञवल्क्य ऋषि को यहीं पर ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह भी मान्यता है कि इसी स्थान पर उन्होंने अनेक दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की।[8] ध्यातव्य है कि उन्होंने शतपथ ब्राह्मण, याज्ञवल्क्य स्मृति, बृहदारण्यक उपनिषद, योग याज्ञवल्क्य एवं अन्य कई ग्रन्थों की रचना की है।

