आजकल मनुस्मृति का अनर्गल विरोध करते कुछ नव बौद्ध नजर आ जाएंगे लेकिन इनमें से किसी ने भी अपने जीवन में कभी मनुस्मृति पढ़ी ही नहीं होगी। खैर अब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 1 फैंसला सुनाते हुए मनुस्मृति का उदाहरण प्रस्तुत किया और उनके अनुरूप फैसला सुनाया, इस फैसले के बाद इन नव बौद्धों का स्थान विशेष नीले से लाल हो गया होगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, भले ही वह उनकी मौत के बाद विधवा हुई हो. केस का फैसला करते हुए जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस SVN भट्टी की बेंच ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए परिवार की महिला सदस्यों का ध्यान रखने की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर दिया.
मनुस्मृति के चैप्टर 8, श्लोक 389 का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा, 'कोई भी मां, कोई भी पिता, कोई भी पत्नी और कोई भी बेटा त्यागने लायक नहीं है, जो व्यक्ति इन निर्दोष (रिश्तेदारों) को छोड़ देता है, उस पर राजा को छह सौ (यूनिट) का जुर्माना लगाना चाहिए. यह श्लोक परिवार के मुखिया की महिला सदस्यों का ध्यान रखने की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर देता है.
कोर्ट ने कहा कि आज भी, गुज़ारा भत्ता कानून के पीछे का विचार वही है - जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है, उन्हें उन लोगों का ध्यान रखना चाहिए जो मृतक पर निर्भर थे.
दिसंबर 2021 में महेंद्र प्रसाद नाम के एक व्यक्ति की मौत के बाद एक परिवार में झगड़ा शुरू हो गया. उनके तीन बेटे थे - रंजीत शर्मा, देविंदर राय और राजीव शर्मा. रंजीत शर्मा की मौत मार्च 2023 में उनके पिता के बाद हुई. उनकी विधवा गीता शर्मा ने बाद में अपने ससुर की जायदाद से गुजारा भत्ता मांगने के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट (HAMA) के तहत केस फाइल किया, जिसमें कहा गया कि वह एक "डिपेंडेंट" हैं और अपने पति रंजीत शर्मा की जायदाद या किसी और सोर्स से अपना गुज़ारा नहीं कर सकती. फैमिली कोर्ट ने उनका केस खारिज कर दिया

