क्रिया योग के अनसुने रहस्य आपको अचंभित कर देंगे
भ्रांति- वजन कम करना तथा शरीर को तोड़ मरोड़ लेना योग नही है.
हमारे शास्त्रों में ऋषियों ने अपनी साधन पद्धति, अपनी अनुभूतियाँ तथा यम नियम आहार विचार का सुन्दर ढंग से समन्वय किया है। इन सभी साधनों के मूल में योग है। योग के द्वारा ही यथार्थ धर्म सम्भव है,योग के द्वारा आप शास्त्रों को समझ पायेंगे। परन्तु आज-कल योग के विषय में लोगों के अन्दर अनेक भ्रांतियाँ है।कुछ लोग योग व्यायाम के कुछ आसनों को ही योग मान लेते है या कुछ लोग साधु तथा संयासी होकर गृह त्याग के बाद ही योग किया जा सकता है, ऐस विचार धारा के हैं। वे सोचते हैं कि गृहस्यी में रहकर यह योग करता अत्यन्त कठिन है तथा उचित भी नहीं है। यह उनकी भूल धारणा है। योग तो मन और प्राण को स्थिर करने की एक पद्धति है। हम गृहस्थी के सभी कर्मो को करते हुए इसे आसानी से कर सकते हैं।
लाहिड़ी महाशय की क्रिया योग में यम और नियम के बारे में हम जानेंगे
जो पहले के समय में आवश्यक था, वह छोड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि यम-नियम सही रूप में पालन करने के पश्चात् यदि दीक्षा दिया जाय तो समय कम मिलेगा और लोग यम-नियम का सही रूप में पालन भी नहीं कर पायेंगे ।उनका मानना था कि जब क्रिया से मन स्थिरता की ओर जैसे-जैसे अग्रसर होगा, ये यम और नियम अपने आप पूर्ण हो जायेगे। उनकी क्रिया पद्धति निम्न प्रकार से है।
🔹 (प्रथम क्रिया)
प्रणाम
१. गुरु प्रणाम-प्राणायाम के द्वारा कुम्भक करके बैठे-बैठे साष्टांग प्रमाण करते हुए इस मन्त्र को मन ही मन कहना और मन्त्रोचारण समाप्त होने पर पुनः पूर्वावस्था में आकर रेचक करना ।
अखंड मंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत् पर्व वशितं मेन, तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
किसी आसन पर - (पद्मासन, सिद्धासन या स्वस्तिकासन जो सुविधाजनक हो) बैठकर गुरु को प्रणाम करना होता है। बैठने के समय यह स्मरण रहे कि मेरुदण्ड सीधा हो । गीता में लिखा है- "समकायो सिरोग्रीवा" अर्थात् मस्तक (गर्दन) और पीठ एक सीध में हों। झुककर न बैठें। गुरु को प्रणाम करने के बाद कार्य आरंभ होता है एवं सभी क्रियात्रों को करने के पश्चात् पुनः आसन से उठने के पहले गुरुप्रणाम किया जाता है।
२. खेचरी मुद्रा- हमारी इन्द्रियों में रसनेन्द्रिय बहुत चंचल होती है।। अतः इसे संयमित करना सर्व प्रथम आवश्यक है। इसमें जिल्ह्वा की जड़ता को समाप्त करने के लिए कुछ उपाय लाहिड़ी महाशय बताते थे। उन उपायों से जिह्वाके नीचे जो पतली-सी नस जो उसे नीचे के जबड़े से जोड़ती है, उसे समाप्त कर दिया जाता है। उपनिषदों में छेदन आदि कष्ठ कारक पद्धतियां दी गयी हैं परन्तु श्री लाहिड़ी महाशय जी ने इसकी सरल पद्धति बतलाया है। जब जिह्वा की जड़ता समाप्त हो जाती है। तब वह तालू के ऊपर, भीतर ही भीतर चली जाती है। इस क्रिया की कोई संख्या निश्चित नहीं है। फिर भी कम से कम १०० बार जरूर चाहिए, अधिक जितना चाहें कर सकते हैं। जब जीभ भीतर प्रवेश कर जाती है तब यह क्रिया करना छोड़ दिया जाता है।
🔹इस क्रिया को करने से क्या लाभ है ?
(क) जिह्वा तालू मूल में प्रवेश कर जाने पर प्रथमतः वाक् संयम होता है। जीभ को भीतर रख लेने पर आप बोल नहीं पायेंगे। अतः बेकार के वार्ता से बच जायेंगे । अधिक बोलने से शक्ति का क्षय होता है और मन भी चंचल होता है।
(ख) कामना-वासना का ह्रास होता है। जीभ को कामना-वासना का प्रधान द्वार माना जाता है। माँ काली की लम्बी जीभ हमें यही बताने के लिए दिखाई गई है। माँ काली रक्त वीर्य असुर का वध अपनी लम्बी जिह्वा पर किया था। यह एक रूपक मात्र है। वास्तव में उससे यही दर्शाया गया है कि अपनी रसना को लम्बी करके उसको तालू कूहर में स्थापित करने पर कामना-वासना रूपी रक्त-बीर्य असुर का नाश होगा। सोचने की बात है कि जगज्जननी के लिए सभी देवता, असुर एवं मानव आदि पुत्रवत हैं। इसलिए माता पुत्र का बध कैसे करेगी ? जब साधारण माताएँ ही पुत्र-वध नहीं कर सकती तो यह तो सारे संसार की माता हैं। अतः यही निर्देश ऋषियों ने दिया है कि खेचरी सिद्ध करो और कामना-वासना को जय करो ।
( ग) सोम रस का पान - जब जिह्वा तालू में प्रवेश करती है, तब सहस्रार से विगलित सोम रस, जिसे अमृत या गुरुवरणोदक भी कहा जाता है, उसका स्वाद मिलता है। अधिकांशतः यह स्वाद मधु जैसा मधुर होता है. कभी-कभी घृत जैसा स्वाद भी आता है। यह रस पान करने पर एक विचित्र नशा जैसा होता है। इससे मन मस्त होकर स्थिर हो जाता है। शराब के नशे से बुद्धि विकृत हो जाती है परन्तु इस से में बुद्धि और मन स्थिर रहते हुए जाग्रत भी रहते है। खेचरी मुद्रा का महत्व अनेक साधकों ने बहुत अधिक कहा है। महायोगी गुरु गोरक्षनाथ कहते हैं -
"न खेचरी सम मुद्रा' अर्थात् योग की समस्त मुद्राओं में खेचरी श्रेष्ठ है। इस खेचरी की अनेक व्याख्याएँ हैं। जैसे तंत्र का मांस भक्षण है। चूंकि जीभ पूरी मांस की बनी होती है इस लिए उसको भीतर प्रवेश कराने को मांस भक्षण से तुलना की गई है।
"मा शब्दे रसना ज्ञेया, तद् अंशम् रसना प्रिये ।
स यो भक्षयेत देवी समवेत् मांस साधकः ।॥
" - शिव संहिता
मा, माने रसना तथा उसका अंश (मा+अंश = मांश) भी रसना हो हुआ उसको भक्षण करना मांस भक्षण है। इस योग प्रक्रिया (खेचरी) को न जानकर तांत्रिक लोग बाहर से किसी जानवर का मांस लाकर खाते हैं। तंत्र के पंचमकार में मास, मदिरा, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन आते हैं। इसमें मांस भक्षण और मदिरापान ये दोनों खेचरी से ही पूर्ण हो जाते हैं। जीभ का भक्षण मांस भक्षण हुआ और सोमरस का पान मदिरा पान है। यही शुद्ध तन्त्र है परन्तु आजकल के तांत्रिक इनसे प्रायः अन-भिज्ञ हैं। मत्स्य और मैथुन प्राणायाम द्वारा होता है, इसे प्राणायाम वर्णन के समय लिखा.
जायेगा। मुद्राएँ तो योग में बहुत हैं, उनमें से जिस किसी को ले सकते हैं। इन्हीं रूपकों को अज्ञानता वश न समझ पाने से पाश्चात् इतिहासकार आर्यों को मदिरा और मांस खाने वाले लिख मारे हैं। शांडिल्योपनिषत् में मषि अथर्वा शांडिल्य ऋषि को कहते हैं-"हे शाण्डिल्य तू खेचरी मुद्रा को भज ।" श्री लाहिड़ी महाशय ने अपने क्रिया योग में खेचरी को प्रथम स्थान दिये हैं।
🔹२ नाभि मुद्रा-हमारे शरीर में मेरुदण्ड या पीठ में रीढ़ की हड्डी (Vertebral) प्रधान हड्डी है। मस्तक उसके ऊपर रखा हुआ है तथा हाथ और पैर भी अपने स्थान पर जोड़ दिये गये हैं। इसी रीढ़ की हड्डी में हमारे शरीर के छः शक्ति केन्द्र अर्थात् छः चक्र अवस्थित हैं। इनमें एक चक्र नाभि के ठीक पीछे रीढ़ में है। इस चक्र को मणिपुर चक्र के नाम से जाना जाता हैं। यह नीली दस पंखुड़ियाँ वाला चक्र कमल, शरीरस्थ तेज का स्थान है। इसका मध्य भाग उगते हुए सूर्य के समान लाल रंग का है एवं उसमें एक त्रिकोण है। यज्ञ कर्ता इसी त्रिकोण की तरह का यज्ञ कृण्ड बनाते परन्तु इसे नहीं जानते, यहीं पर समान वायु भी रहती है। यह वैश्वानर या अग्नि का स्थान भी कहा गया है। प्रारं-भिक साधकों को यह (अन्य चक्रों के समान ही) हल्के सफेद धब्बे जैसा दिखता है। साधारणतया यह नीले, लाल एवं कभी पीतवर्ण तथा सफेद रंग का भी दिखता है। मन की वृत्तियों के अनुसार इसका भिन्न-भिन्न रंग दिखलाई देता है। यह चक्र नाभि के ठीक पीछे होने के कारण इस पर की जाने की क्रिया को नाभि क्रिया कहा जाता है। वैसे नाभि से इसका कुछ लेना देना नहीं है। गीता में भगवान कहते हैं
"अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देह माश्रितः । प्राणापान समायुक्तः पचाम्यन्नं चतुविधम् ।।
अर्थात् भगवान वैश्वानर रूप से चारो प्रकार के खाए हुए भोजन को नाभि में स्थित होकर पचाते हैं। यह शरीर का संतुलन भी रखता है। इस क्रिया से जब तेज जाग्रत होता है तो पेट की तमाम गड़बड़ियों को ठीक करता है। मुझे इसका रूप श्वेत रंग की अग्नि शिखाओं से आवृत्त कमलवत दिखाई दिया । वैसे अन्य रूप भी दिखा परन्तु श्वेत अग्नि शिवाओं से आवृत रूप बड़ा था। सुनहरे रंग का खिला हुआ कमल जैसा भी दिखा। इसमें एक देवी मूर्ति जिसका रंग दूध एवं लाल रंग मिलाने से जैसा रंग होता है, उसी रंग का शरीर बड़ा ही सुन्दर रूप था । एवं हल्के गुलाबी परिधान में दिखलाई दी यह ज्या देवी का रूप है, शरीर के इस मणि-पूरक चक्र के आस-पास एक कड़ा मांस-पिण्ड है जो शव को जलाने पर भी नहीं जलता, क्योंकि अग्नि, अग्नि को नहीं जला सकती । इसी स्थान पर नाभि भीतर से खींचकर बंधी रहती है। लोग इसी को फुल्ला भी कहते हैं और शव दाह के उपरांत इसी को काशी आदि तीर्थों में ले जाकर गंगा में विसर्जन करतें हैं। इस पर जप की संख्या प्राणायाम की संख्या से संबद्ध है। प्रारम्भमें सामने से १०० और उसी स्थान पर पीछे से २५ जप होते हैं। जैसे-जैसे प्राणायाम की संख्या बढ़ती है, यह भी प्रति १२ प्राणायाम पर १०० + २५ के अनुपात में बढ़ती रहती है। अन्त में १४४ प्राणायाम पर इसकी संख्या १२०० + ३०० हो जाती है। प्रायः यही इसकी अधिकतम संख्या मानी जाती है। इस मणिपुर चक्र की क्रिया करके प्राण के तेज को जाग्रत करने के उपरांत श्री लाहिड़ी महाशय ने प्राणायाम करने का विधान किया है। यह बहुत ही वैज्ञानिक लगता है। अग्नि प्रज्वलित करने के उपरांत जैसे उसे और अधिक उद्दीप्त करने के लिए हवा दिया जाता है, वैसे नाभि क्रिया द्वारा प्राण के तेज को जागृत करने के पश्चात्, प्राणायाम द्वारा उसे और उद्दीप्त किया जाता है। कुछ क्रियावान जब प्राणायाम की संख्या बढ़ाते हैं तो नाभि क्रिया की संख्या कुछ कम कर देते हैं। मेरे विचार से यह लाभदायक नहीं है। इसको पूरा करना चाहिए । इसी क्रिया से मन स्थिर होता है। इस क्रिया की परिपक्वता होने पर श्वांस चलना रूक जाता है और मन पूर्णरूप से स्थिर हो जाता है। यह रुद्र का भी स्थान कहा गया है। रक्त वर्ण के रुद्र का भी दर्शन यहीं होता है। जब कभी उत्तम प्राणायाम होता है तो मन मणिपुर चक्र से भी सुषुम्णा में घुस जाता है। अतः यह भी साबित हुआ कि सुषुम्णा में यहाँ से ही प्रवेश किया जा सकता है। इस पर ठीक से ध्यान युक्त क्रिया करने पर तिल्ली, ऑत, पेंक्रियाज आदि अंगों की शक्ति बढ़ती है। क्षुधा भी बढ़ती है इसके बाद प्राणायाम आता है। प्राणायाम - "प्राणायाम महाधर्मो वेदानामप्यगोचरो ।" अर्थात् प्राणायाम ही महान् धर्म है, इसकी महिमा वेद भो पूर्णरूप से व्यक्त नहीं कर पाये हैं। तो प्राणायाम क्या है? मानव शरीर में मेरुदण्ड की प्रधान अस्थि है। इसके भीतर एक सुराख है। इसी सुराख में ब्रह्म रन्ध्र से आने वाली सुषुम्णा नाड़ी आज्ञा-चक्र से आकर प्रवेश करती है। यह नाड़ी पूरी मेरुदण्ड को पार करती हुई मूलाधार चक्र में स्थित शिवलिंग से थोड़ा ऊपर ही रुक जाती है। इसका नीचे का सिरा, सर्पाकार कुल कुण्डलिनी, जो सार्धतृवलयाकार रूप में शिव सरूप है उसके फण से बन्द रहता है। इस नाड़ी में ९ चक्र हैं। इस नाड़ी के दोनों पाश्वों में दो चंचल नाड़ियाँ है। इसमें एक का नाम ईड़ा तथा दूसरे का नाम पिगला है। ईड़ा तमोगुण का प्रतिनिधित्व करती है और पिगला रजोगुण का । य दोनों चंचला नाड़ियाँ मूलाधार से उठाकर सुषुम्णा के दोनों पारों से होती हुई उसमें स्थित चक्र को घेरते हुए चक्रों के नीचे और ऊपर एक दूसरे को काटती हुई आज्ञाचक्र तक जाती हैं। इड़ा को चन्द्र नाड़ी पिंगला को सूर्य नाड़ी कहते हैं। इनके मध्य में सुषुम्णा, उज्वल ज्योति से जगमगाती हुई, सतोगुणी नाड़ी है। मन प्रायः (ईड़ा और पिंगला) चंचल नाड़ियों से रमण करता है तथा उनके गुणों से प्रभावित होकर तामसिक और राजसिक कायों को करता है। तदनुसार पापादि में लिप्त होकर नाना प्रकार की योनियों में भ्रमण करता है। जन्म-मरण के बन्धन में पड़कर अज्ञानता वश अनेकों कष्ट झेलता है। प्राणायाम में मन को इन दोनों चंचल नाड़ियों से हटाकर सुषुम्णा में प्रवेश कराने का प्रयत्न किया जाता है। सुषुम्णा में जब मन प्रवेश करता है तो उसकी सारी चंचलता समाप्त हो जाती है। तब मन स्थिरता को प्राप्त कर आनन्द मग्न होकर अपने स्वरूप प्राण के साथ युक्त होकर आत्मा में मिलकर ब्रह्म स्वरूप हो जाता है। सुषुम्णा (सरस्वती) में स्नान करके मन पवित्र और निष्पाप हो जाता है। ईड़ा और पिंगला में जो चंचल वायु है उसको स्थिर करना ही तन्त्र में मत्स्य भक्षण कहा जाता है। जैसे मत्स्य एक स्थान पर स्थिर नहीं रहती, उसी प्रकार ईड़ा-विगला के अन्दर की चंचल वायु भी सर्वदा चलायमान रहती है। इनको प्राणायाम द्वारा जब करना ही मत्स्य भक्षण कहलाता है अन्यथा नदी या तालाब से मछली पकड़कर खाने से तो केवल जिह्वा की तृप्ति होती है और क्षुधा निवारण मात्र होता है। तन्त्र का दूसरा मकार मैथुन भी प्राणायाम की अवस्था का नाम है। जब मन प्राण के साथ सुषुम्णा में प्रवेश करता है तो मैथुन से मेल खाती एक आनन्दमय अवस्था का अनुभव होता है। उस समय प्रारंभ में ही गुह्य द्वार से थोड़ा ऊपर और नाभि के नीचे की स्थिति में यह अनुभव होता है। इस सम्म मैथुन की जैसी अनुभूति होती है। शरीर कांप उठता है। प्राण के सुषुम्णा में उठते समय वह बोध होता है। बारंबार उसमें प्रवेश करने पर यह बोध उस अजीब आनन्द से युक्त होकर आज्ञा चक्र में जाकर स्थिर हो जाने पर उसकी पूर्णता का अनुभव होता है। प्राण का आयाम (विस्तार) ही प्राणायाम है। प्राण को उसके विभिन्न कार्यों एवं स्थान भेद से ९ नाम दिये गये हैं- प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान । वास्तव में ये सब मिलकर प्राण ही हैं। नाभि से कंठ तक जिसके संचरण से श्वसन क्रिया होती है, उसे प्राण कहा जाता है। नाभि में समान का अवस्थान है, जो प्राण और अपान का संधिस्थल है। यह शरीर का संतुलन रखता है एवं प्राण के तेज (अग्नि) को धारण करता है। नाभि से नीचे मूलाधार चक्र या यों कहिए कि रीढ़ के सबसे निचले भाग तक फैली प्राण वायु के हिस्से को अपान कहते हैं। इसका कार्य नाभि से नीचे की इन्द्रियों को बल देना या सम्हालना है। मल विसर्जन, प्रजनन, प्रसव आदि इसके प्रधान कार्य हैं। यह शरीर के मल को बाहर फेंकता है। कंठ से ऊपर के प्राण के हिस्से को जो गर्दन के ऊपर की इन्द्रियों के कार्यों को नियन्त्रित करता है, उसे "उदान" कहते हैं। सारे शरीर में व्याप्त त्वचा आदि के कार्यों का नियन्त्रण करने वाला व्यान कहलाता है ।
वैसे तो साधारण रूप से सब अपने-अपने क्षेत्र में रह रहकर अपना-अपना कार्य करते हैं परन्तु प्राणायाम करने के समय सबको अपने-अपने स्थान से लाकर प्राण के साथ युक्त करते हैं। यह जो नाभि से कण्ठ तक विचरण करने वाला प्राण है, उसे योगिक प्रक्रिया द्वारा विस्तारित करके, समस्त प्राणों को एकत्र करके बहिर्मुखी से अन्तर मुखी करने की प्रक्रिया को ही "प्राण का आयाम" क्रहते हैं। यह प्रक्रिया मृत्युकाल में स्वतः होती है। प्राण जब शरीर से उत्क्रमण करता है, तब पाँचों प्राणों को अपने में मिलाकर एक प्राण करके शरीर का त्याग करता है। उस समय यदि कोई ध्यान दे तो दिखाई पड़ेगा कि श्वांस काफी लम्बी और विचित्र ढंग से अपने अन्तर में एक खिंचाव के साथ चलती है। प्राण की इंचल गति को हम श्वांस की गति संख्या से समझ सकते हैं। क्रिया योग द्वारा जीवित काल में ही पांचों प्राणों को मृत्युकाल के सामान ही एकत्र करके चालित किया जाता है। इसी को प्राणायाम कहते हैं। प्राण जब श्वांस-प्रश्वांत रूपी घोड़े का आश्रय लेता है, तब उसका एक चंचल भाग इन्द्रियों के सानिध्य में आकर बहिर्मुखी संसार का भोग करता है प्राण के इसी भाव को जिसके द्वारा विषयों को भोग किया जाता है, "मन" कहा जाता है। जब यह मन अन्तर्मुखी होता है, तब शरीर के बाह्य कार्य कम होने लगते हैं। अंततः जब प्राण में मन लीन हो जाता है, तब शरीर का बोध समाप्त हो जाता है। इसके परिणाम स्वरूप अपान और व्यान प्राण से संयुक्त होकर प्राण के साथ ऊपर उठते हैं। यह उध्वंगामी गति उदान को साथ में लेकर आज्ञा चक्र में स्थिति को प्राप्त हो जाती है। यही अवस्था योग की वास्तविक अवस्था है। मन के वहिर्मुखी होने पर शरीर की शक्ति का क्षय होता है। इसी क्षय को पूर्ण करने के लिए अधिक आक्सीजन की आवश्यकता होती है। अतः श्वांस अधिक चलती है। इस श्वांस के चलने पर प्राण का चलाचल भी होता है। चूंकि श्वांस के साथ प्राण का सम्बन्ध है इसीलिए प्राण की चंचलता में वृद्धि होती है; यथा - 'चले बाते चले चित्तं, निश्चले निश्चलो भवेत् ।" यदि मन अन्तर्मुखी हो जाय और इन्द्रियों का साहचर्य छोड़ दे तो वह स्वाभाविक रूप से स्थिर हो जायेगा ।
योनिमुद्रा - प्राणायाम की क्रिया समाप्त होने के उपरांत २४ घटे में १ बार योनि मुद्रा करने का विधान है। वैसे उन्नत साधकों को यह क्रिया करने की आवश्यकता कम होती है क्योंकि उनको कूटस्थ का दर्शन या चक्रों का दर्शन प्रायः स्वतः हुआ करता है। प्राणायाम यदि कर्म है तो योनि मुद्रा शान है। चीता में योनि मुद्रा से सम्बन्धित एक श्लोक है वह यहाँ दिया जा रहा है-
"सर्व द्वाराणि संयम्य मनो हृदिनिरुद्ध च ।
मूर्धानधायात्मन प्राणंस्थितो योग धारणाम् ।।
शरीर के समस्य इन्द्रिय द्वारों को बन्द करके मन प्राण) को मूर्धा में प्राणायाम द्वारा स्थिर करना योग की स्थिति है। गुरु के निर्देशानुसार इसको १ या २ मिनट से अधिक करना श्रेयस्कर नहीं है। प्राचीन काल में उपनयन संस्कार के समय ब्रह्मबारी का तृतीय नेत्र गुरु खोल देते थे और तब उनको उपनयन के सूत्र पहनाते थे। उपनयन के माने ही तृतीय नेत्र है। उपनयन सूत्र (जनेऊ) तो मात्र एक बाह्य चिह्न है, जिसको गले में इसलिए पहनाया जाता था ताकि लोग यह समझ जाये कि यह विप्र है। इसके ज्ञान नेत्र खुल गये हैं। आजकल तो उप-नवन संस्कार में कुछ बाह्य औपचारिकताओं के साथ गायत्री मंत्र देकर समाप्त कर दिया जाता है। प्राणायाम जितना अच्छा होगा, योनिमुद्रा उतनी ही अधिक आनन्द प्रदान करेगी । प्राणायाम अच्छा होता है या नहीं उसका प्रमाण योनि मुद्रा में दर्शन क्रिया से स्पष्ट होता है। इड़ा-पिंगला से प्रत्यहृत् होकर प्राण जब सुषुम्णा में प्रवेश करता है तो करोड़ों सूर्य का प्रकाश योनि मुद्रा में अनुभव होता यह क्रिया अत्यन्त गोपनीय है।
To be continued …… maha mudra

