अपराधियों पर नरमी होगी तो अपराध तो बढ़ेगा ही - अपराध को रोकना है तो दंड विधान को मजबूत होना चाहिए लेकिन भारत में हमारा न्यातंत्र क्या करता है वो बताने की आवश्यकता नहीं। अनेकों अपराधियों को तो वर्षों तक सजा नहीं होती और जिनको होती भी है उनमें से अधिकतर को या तो जल्दी बारी कर दिया जाता है या सजा कम कर दी जाती है। कई मामलों में तो बेल पर छूटकर अपराधी पुनः अपराध करते हैं।
कुछ ऐसे आदेश होते हैं विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जिनके अनुसार महिलाओं और बच्चियों पर यौन अपराध करने वालों राहत दे दी जाती है और ये एक मुख्य कारण माना जा सकता है ऐसे यौन अपराधों के बढ़ने के पीछे - ऐसे कुछ मामलों पर नज़र डालते हैं 👇
मध्यप्रदेश में एक 4 साल की बच्ची का बलात्कार के बाद हत्या के मामले में एक अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फांसी और हाई कोर्ट द्वारा मुहर लगाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया और ऐसा करते हुए गज़ब का प्रवचन भी दिया कि “Every Saint has a past and Every Sinner has a Future” - मतलब एक अपराधी की चिंता होनी चाहिए, 4 साल की बच्ची के भविष्य से कुछ मतलब नहीं है -
कुछ दिन पहले 26 जून, 2024 को ओडिशा हाई कोर्ट के जस्टिस एस के साहू और जस्टिस आर के पटनायक की खंडपीठ ने अपराधियों की फांसी की सजा बदल दी - आरोपी अकील को तो बरी कर दिया और आसिफ की सजा फांसी से उम्रकैद में बदल दी - इन दोनों ने 21 अगस्त, 2014 को एक 6 साल की बच्ची का अपहरण किया और उससे दुष्कर्म किया जिसकी बाद में मौत हो गई -
एक घटिया सोच का परिचय देते हुए जजों ने कहा कि “आरोपी दिन में कई बार नमाज अदा करता है, चूँकि उसने खुद को अल्लाह को समर्पित कर दिया है, ऐसे में वो कोई भी सजा भुगतने को तैयार है” ऐसे तर्क दिए जाएंगे अदालतों द्वारा अपराधियों को छोड़ने के लिए तो बच्चियों और महिलाओं पर होने वाले यौन अपराध तो बढ़ेंगे ही -
अभी कल ही मेघालय हाई कोर्ट के Chief Justice S. Vaidyanathan and Justice W. Diengdoh ने 13 वर्षीय पीड़िता के बयानों में एकरूपता को देखते हुए, आरोपों की गंभीरता को भी समझते हुए और पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि को देखते हुए फैसला देते हुए आरोपी की उम्रकैद (30 साल) की सजा को मात्र 7 साल की सजा में बदल दिया - ऐसा करने के पीछे एक कारण और दिया जो बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि बच्ची आरोपी को जानती थी - और आरोपी को पश्चाताप का मौका ही नहीं मिलेगा -
जून, 2021 में नागपुर हाई कोर्ट की जस्टिस पुष्पा गनेड़ीवाला ने आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि पीड़िता के साथ कोई skin to skin contact नहीं हुआ - इस केस में रिपोर्ट थी कि accused had taken the 12-year-old victim to his house on the pretext of giving her guava, tried to remove her salwar and pressed her breast. He then pressed her mouth when she started shouting - इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था 19 नवंबर 2021 को जब हाई कोर्ट के फैसले की सोशल मीडिया पर बहुत निंदा हुई थी - सुप्रीम कोर्ट की बेंच में थे जस्टिस UU Lalit, Bela Trivedi, और S. Ravindra Bhat...
समस्या यह है कि नाबालिग बच्चियों से बलात्कार के मामले सामने आने पर विभिन्न हाई सुप्रीम कोर्ट एक ही गीत गाने लगते हैं कि सेक्स के लिए लड़कियों के लिए सहमति की आयु कम करनी चाहिए - लेकिन आप सहमति की आयु कितनी कम कर देंगे - अभी पोक्सो एक्ट कहता है नाबालिग से सेक्स चाहे सहमति से हो या न हो, रेप ही माना जाएगा –
रेप तो हर आयु की बच्ची के साथ हो रहे हैं 4 साल, 6 साल, 12 साल, 14 साल, 15 साल - ऐसे में कैसे सहमति की आयु नियत कर सकते हो -
अभी 2 दिन पहले अजमेर में 32 साल पहले 100 लड़कियों से बलात्कार और blackmailing के मामले में 6 चिश्ती आरोपियों को उम्रकैद दी गई है - पता नहीं सुप्रीम कोर्ट तक जाते जाते क्या होगा -
सबसे ज्यादा विचारणीय बात यही है जो मैं बहुत समय से कहता आ रहा हूं कि क्योंकि न्यायपालिका के जज और उनके परिवार संरक्षित और सुरक्षित रहते हैं और अपराध के शिकार नहीं होते, इसलिए ऐसे फैसले दिए जाते हैं, बरी कर दो, या सजा कम कर दो - पोक्सो एक्ट की तो ऐसी तैसी करने में लगे हैं अदालतें -
(सुभाष चन्द्र )

