यूपी क्यों और किनकी वजह से पिछड़ा रह गया था, उसका सबसे बड़ा सबूत ये रहा ⬇️.
योगी सरकार ने सिर्फ़ इतना चाहा था कि सरकारी स्कूलों में टीचर समय पर आएँ। कुछ टीचर्स ने विद्रोह कर दिया और राजनेता गिद्ध बनकर मंडराने लगे।
सरकार नहीं, जनता हार गई।
हर बैंककर्मी अपनी ब्रांच में समय पर पहुँचता है, चाहे उनकी ब्रांच कितनी भी दूर दराज क्यों न हो। रेलवे स्टेशन या पोस्ट बीहड़ जंगल में हो तो भी रेलवे कर्मचारी वहीं रहता है। सैनिक जहां ड्यूटी लगती है, वहीं रहते हैं। पुलिस वाले जहां कहीं चौकी या थाना हो, अक्सर वहीं रहते भी हैं। सिंचाई विभाग और जंगलात में भी यही होता है।
प्राइवेट सेक्टर में तो आपको कहाँ होना है, ये च्वाइस ही नहीं है। जहां कंपनी ने कह दिया, वही अंतिम बात है।
पर यूपी के सरकारी स्कूलों के कुछ टीचर शहरों में रहकर दूर गाँव के स्कूलों में ड्यूटी करना चाहते हैं। या अपने गाँव में रहकर ही कहीं दूर नौकरी करना चाहते हैं।
जब अटैंडेंस लगाने की बात आती है तो विरोध में आंदोलन कर देते हैं और देश में आप जैसे नेता हैं जो गरीब और ख़ासकर एससी, एसटी और ओबीसी बच्चों का हित भूलकर चंद टीचर्स के साथ खड़े हो जाते हैं।
ज़्यादातर टीचर काम करना चाहते हैं। पर अखिलेश जी आप लोगों को इससे क्या?
सरकारी स्कूलों में कौन पढ़ता है, ये शायद आप नहीं जानते होंगे। आपके बच्चे तो विदेश में पढ़ते हैं।
यूपी के ग़रीबों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना और शोक! और आपको धिक्कार।
सर्वप्रथम तो शिक्षक परीक्षा फॉर्म भरते समय भी इन लोगों को वस्तुस्थिति का पता तो होगा ही !
30-70 हज़ार तक मासिक सैलरी पाने वालों पर भी दुखों का पहाड़ गिरा रहता है, गर्मी में बेहोश होते हैं, सर्दी में ठंड लगती है इन्हें, और गर्मी में बेहोशी और लू लगते रहती है इन्हें ? 😳
इनसे एक तिहाई सैलरी में प्राइवेट स्कूल के शिक्षक काम करते हैं।लेकिन नहीं, इन्हें तो निठ्ठलेपन की आदत है। प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी कहीं विजिट के बाद “डिजिटल सेल्फ़ी” अपने रिपोर्टिंग बॉस को भेजते हैं, या सिस्टम पर अपलोड करते हैं।8:30 से 2:30 ! लेकिन इन्हें दिक़्क़त है।
धन्य है “सरकारी नौकरी” भाई।🤷♂️

