सोचिए… आप डॉक्टर बनने मेडिकल कॉलेज जाएं और आपकी HOD आपसे कहे, “कलमा पढ़ो, नमाज़ सीखो, इस्लाम अपनाओ… और किसी मुस्लिम लड़के से शादी करो।” सवाल है, ये मेडिकल कॉलेज है या धर्म बदलने का सेंटर? ये बात किसी मदरसे की नहीं हो रही। ये आरोप सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज की सस्पेंडेड HOD डॉ. सुमैया मुल्ला पर उनकी पूर्व छात्राओं ने लगाए हैं।
पूर्व छात्राओं के आरोप बेहद गंभीर हैं। कहा गया कि उन्हें मौलानाओं के वीडियो दिखाए गए, कलमा पढ़ने और नमाज़ सीखने का दबाव बनाया गया। हिंदू धर्म को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक बातें कही गईं और एक छात्रा को मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने की सलाह तक दी गई। अब जरा सोचिए… एक छात्रा अपने परिवार से दूर मेडिकल कॉलेज में पढ़ने आती है। उसका सपना डॉक्टर बनने का है। और अगर उसी कॉलेज में कोई ताकतवर पद पर बैठा व्यक्ति उसके धर्म और निजी जिंदगी को प्रभावित करने की कोशिश करे, तो क्या ये सिर्फ “व्यक्तिगत सलाह” है? बिल्कुल नहीं। और मामला यहीं खत्म नहीं होता।
पूर्व छात्रों और कर्मचारियों ने सरकारी संसाधनों के कथित दुरुपयोग, विद्यार्थियों से निजी काम करवाने, परीक्षा और करियर खराब करने की धमकी देने और वर्षों तक शिकायतों को दबाए जाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं। अब एक सीधा सवाल, अगर किसी मुस्लिम छात्रा की HOD उससे हनुमान चालीसा पढ़ने, हिंदू धर्म अपनाने और किसी हिंदू लड़के से शादी करने को कहती, तो क्या देश इसे भी “निजी सलाह” कहकर चुप बैठ जाता? शायद नहीं। तो फिर जब ऐसी शिकायतें हिंदू छात्राओं की तरफ से आती हैं, तो उन पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल क्यों नहीं उठने चाहिए?
डॉ. सुमैया मुल्ला वही HOD हैं जिन्हें डॉ. हर्ष पांड्या की मौत से जुड़े रैगिंग मामले में डिपार्टमेंट की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के बाद 90 दिनों के लिए सस्पेंड किया गया था। इसलिए सवाल सिर्फ एक HOD का नहीं है। सवाल है, क्या किसी शिक्षण संस्थान में पद और पावर का इस्तेमाल छात्रों की आस्था, निजी जिंदगी और भविष्य को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है? देश में अलग-अलग जगहों से धर्मांतरण के लिए दबाव, लालच, नौकरी, प्यार या पद की ताकत के इस्तेमाल के आरोप सामने आते रहे हैं।
अगर इस मामले में भी किसी ऑर्गेनाइज्ड कन्वर्जन नेटवर्क का सबूत मिलता है, तो कार्रवाई सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।पूरी चेन की जांच होनी चाहिए। किसने दबाव बनाया किसने मदद की? किसने शिकायतें दबाईं? और अगर किसी ने दोषियों को बचाया, तो उन्हें भी जवाब देना चाहिए। किसी व्यक्ति का अपनी मर्जी से धर्म बदलना उसका निजी अधिकार है। लेकिन धमकी, लालच, दबाव या करियर बर्बाद करने के डर से धर्म बदलवाना आस्था नहीं है, ये शोषण है। इसलिए गुजरात सरकार को डॉ. सुमैया मुल्ला के पूरे कार्यकाल और उनके खिलाफ लगाए गए पुराने आरोपों की निष्पक्ष और गहराई से जांच करानी चाहिए।
आरोप सही साबित हों तो कार्रवाई सिर्फ 90 दिन के सस्पेंशन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। दोष साबित होने पर बर्खास्तगी और कानून के मुताबिक कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि मेडिकल कॉलेज में बच्चों का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी होती है…
उनकी आस्था बदलने की नहीं।

