त्रिपुरा में सेना पर हमला करने वाले मजहबी सोच रहे थे कि बैक डोर से भाजपा विरोधी नेताओं का सपोर्ट मिलेगा और जवानों को पीटने के बाद सेफ लैडिंग कर लेंगे |लेकिन राष्ट्रवादी विचारों के हिंदुओं ने सेना के जवानों की पिटाई को अपने परिवार के सदस्य की पिटाई की तरह महसूस किया और मामला नेशनल बना दिया |
अब सेना के जवान भी हमला करने वालों को सड़कों पर घुमा कर बाकी मजहबियों को बता रहे हैं कि त्रिपुरा बांग्लादेश का ढाका नहीं है - उद्यम बेशक कर लिया बाद में हिसाब पाई पाई का देना पड़ेगा | सही मायने में देखा जाए तो सुना के जवान हमारे ही परिवार के हिस्सा है इसलिए आम जनता को सुना के जवानों पर होने वाले हमले को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।
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