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दीपावली का त्योहार आते ही घरों की साफ-सफाई, नए कपड़ों और दीयों की जगमगाहट के बीच एक बहुत ही स्वाभाविक और प्यारा सा सवाल मन में आता है— जब यह पर्व भगवान श्रीराम के 14 वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है, तो फिर इस दिन भगवान श्रीराम की जगह मां लक्ष्मी और श्री गणेश की पूजा क्यों की जाती है..?
यदि यह सवाल आज किसी से पूछ लिया जाए, तो ज्यादातर लोगों के पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं होगा। हम सब पीढ़ियों से यह त्योहार मनाते आ रहे हैं, लेकिन इसके पीछे के इतिहास और तर्क से अनभिज्ञ हैं। आइए, इस पावन पर्व के उस सुंदर और तार्किक रहस्य को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं, जो सतयुग से लेकर त्रेतायुग तक की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को आपस में जोड़ता है।
दीपावली का यह पर्व मुख्य रूप से दो अलग-अलग युगों की दो बड़ी घटनाओं का मेल है। त्रेतायुग में लंका विजय के बाद जब मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ कार्तिक मास की अमावस्या को अयोध्या लौटे थे, तो नगरवासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी वजह से इसे 'दीपावली' यानी दीपों की कतार वाला उत्सव कहा गया। वहीं, इससे भी बहुत पहले सतयुग में इसी कार्तिक अमावस्या के दिन समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं, इसलिए इस तिथि को मां लक्ष्मी के प्रगटोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। यानी एक ही दिन पर दो बड़े प्रसंग जुड़ने के कारण इस पर्व में प्रभु श्रीराम जी के स्वागत के साथ-साथ मां लक्ष्मी की पूजा की परंपरा भी जुड़ गई।
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अब दूसरा सवाल यह आता है कि मां लक्ष्मी के साथ हमेशा श्री गणेश जी की पूजा क्यों होती है, जबकि दोनों का आपस में माता-पुत्र का संबंध है..? इसके पीछे की पौराणिक कथा बेहद तार्किक और गहरी है। समुद्र मंथन के बाद जब माता लक्ष्मी का विवाह भगवान विष्णु से हुआ, तो उन्हें धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया। मां लक्ष्मी ने धन के सही वितरण के लिए यक्षराज कुबेर को अपना मैनेजर यानी भंडारी बना दिया। लेकिन कुबेर थोड़े कंजूस स्वभाव के थे और वे धन को अपने पास सुरक्षित रखकर बैठ गए, जिससे जरूरतमंदों तक वह ठीक से पहुँच नहीं पा रहा था।
जब मां लक्ष्मी ने अपनी यह पीड़ा भगवान विष्णु को बताई, तो उन्होंने कहा कि तुम अपना मैनेजर बदल लो। मां लक्ष्मी ने कहा कि कुबेर उनके परम भक्त हैं, इसलिए उन्हें बुरा लग जाएगा। तब भगवान विष्णु ने उन्हें बुद्धि के देवता श्री गणेश जी की मदद लेने की सलाह दी। मां लक्ष्मी ने जब गणेश जी से धन बांटने का आग्रह किया, तो महाबुद्धिमान गणेश जी ने शर्त रखी कि वे जिसका भी नाम लेंगे, मां लक्ष्मी को उस पर बिना किसी सवाल के अपनी कृपा बरसानी होगी। मां लक्ष्मी के राजी होने के बाद गणेश जी ने लोगों के भाग्य की बाधाओं को दूर करके धनागमन के रास्ते खोल दिए। कुबेर सिर्फ धन के रखवाले बनकर रह गए और असली रूप से धन बांटने वाले गणेश जी बन गए।
गणेश जी की इस उदारता से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जहाँ उनके पति भगवान विष्णु उनके साथ नहीं होंगे (जैसे कार्तिक अमावस्या का समय, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं), वहाँ पुत्र रूप में गणेश जी हमेशा उनके साथ रहेंगे। यही कारण है कि कार्तिक अमावस्या पर जब भगवान विष्णु शयन में होते हैं, तब मां लक्ष्मी की पूजा उनके मानस पुत्र श्री गणेश के साथ की जाती है।
लेकिन विडंबना देखिए कि आज का आधुनिक समाज त्योहारों को केवल 'पार्टी', 'मनोरंजन', 'सेल्फी' और 'छुट्टी' का साधन मान बैठा है। फाइव स्टार होटल की पार्टियों, मॉल की चकाचौंध और रील्स बनाने में डूबे समाज को यह अहसास ही नहीं है कि हमारे हर एक त्योहार के पीछे कितना गहरा विज्ञान और दर्शन छिपा है। धर्म को अंधविश्वास या सिर्फ एक औपचारिकता कहने वालों, क्या कभी सोचा है कि तुम्हारे त्योहारों का यह वास्तविक इतिहास तुम्हारी आधुनिक किताबों से क्यों गायब कर दिया गया है..? क्या इसलिए ताकि तुम अपनी जड़ों से कट जाओ और बिना सोचे-समझें अपनी ही संस्कृति को भूल जाओ..? जब तक तुम अपनी संस्कृति के इन मूल रहस्यों को नहीं जानोगे, तब तक तुम्हारी आधुनिकता खोखली और तुम्हारी शिक्षा अधूरी है।
अब यह हमारा दायित्व है कि हम केवल त्योहार की बाहरी चमक-दमक और उपभोगवादी संस्कृति तक सीमित न रहें, बल्कि उसके पीछे छिपे इन सुंदर और वैज्ञानिक भावों को समझें और अपनी आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाएं। इस बार दीपावली पर सिर्फ दीये मत जलाओ, अपने सोए हुए विवेक और ज्ञान के दीये भी जलाओ।
आप सभी को परिवार सहित दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं! 🙏💥
यदि आपको यह जानकारी सार्थक लगी हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें।
✍️ साभार
🔏 लेखक : पंकज सनातनी
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