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🔏 लेखक : पंकज सनातनी
कल विजयदशमी थी। हर साल की तरह कल भी हमने रावण जलते देखा। आसमान में रंग-बिरंगे पटाखे छूट रहे थे, चारों तरफ शोर था, रील्स और स्टेटस के लिए वीडियो बन रहे थे, लोग डीजे की धुन पर नाच रहे थे और सबको यही लग रहा था कि आज हमने बुराई को हमेशा के लिए हरा दिया।
लेकिन भाईसाहब, जब कल रात्रि घर लौटकर सुकून से बैठा और इस आधुनिकीकरण के दौर को देखा, तो एक बहुत चुभने वाला सवाल मेरे दिमाग में आया— क्या आज के समय में हमारे त्यौहार सिर्फ 'मनोरंजन' और 'इवेंट' बनकर रह गए हैं..? क्या सच में रावण मर गया..?
आज हमने अपनी संस्कृति और सनातन धर्म के इतने गहरे और वैज्ञानिक दर्शन को केवल डीजे, खान-पान, आतिशबाज़ी और इंस्टाग्राम की रील्स तक सीमित कर दिया है। त्यौहार का मतलब अब आत्ममंथन नहीं, बल्कि सिर्फ पार्टी करना और भीड़ का हिस्सा बनना रह गया है। अगर वाकई रावण जलकर खत्म हो चुका होता, तो क्या आज भी हमारे समाज में अहंकार, भ्रष्टाचार, और अपनों के बीच की कलह वैसी ही ज़िंदा रहती..? जरा स्वयं से पूछिए, क्या आज लोगों का लालच कम हुआ है..? क्या किसी की तरक्की देखकर जलने वाले लोग कम हुए हैं..? सच तो ये है कि कागज और बांस का पुतला हर साल कुछ मिनटों में जलकर राख हो जाता है, लेकिन असली रावण आज भी हमारे दफ्तरों, हमारे घरों और हमारी सोच में बड़े आराम से बैठा है। हम हर साल एक पुतला फूंक देते हैं और सोचते हैं कि हमने धर्म की रक्षा कर ली, जबकि अंदर की बुराइयां जस की तस बनी रहती हैं।
हमारे सनातन शास्त्रों में भी रावण के दस सिर का जो रहस्य बताया गया है, वो बहुत गजब का है। लोग सोचते हैं कि उसके सचमुच दस सिर थे, पर शास्त्र असल में हमारे मन की दस प्रवृत्तियों की बात करते हैं— हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियां और पाँच कर्मेंद्रियां। जब इंसान इन दसों इंद्रियों के काबू से बाहर हो जाता है और इनका गुलाम बन जाता है, तब उसके अंदर का रावण जाग उठता है। रावण कोई मामूली इंसान थोड़ी था, वो वेदों का ज्ञाता था, महाज्ञानी था, सोने की लंका का मालिक था— उसके पास सब कुछ था! फिर उसका पतन किस चीज़ ने किया..? उसके अड़ियल अहंकार और अनियंत्रित लालच ने। लेकिन आज की पीढ़ी जो खुद को मॉडर्न कहती है, वो बिना शास्त्रों को पढ़े, बिना उनके गहरे अर्थ को समझे, बस त्यौहार को एक फेस्टिवल या पार्टी मानकर निकल जाती है।
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शास्त्रों में अग्नि का मतलब सिर्फ जलाना या राख करना नहीं है, बल्कि 'दहन' का मतलब होता है पावन करना और सुधारना। ज्ञान की वो अग्नि जो हमारे अंदर के मोह, मद, काम, क्रोध और लोभ को भस्म कर दे, असली दहन वही है। जब तक हमारे अंदर की ये तृष्णा और ईर्ष्या जिंदा है, तब तक बाहरी पुतले को जलाना सिर्फ एक ड्रामा और कर्मकांड बनकर रह जाता है। तार्किकता कहती है कि असली युद्ध बाहर नहीं, भीतर लड़ा जाता है। विजयदशमी का असली मतलब तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक इंसान अपने अंदर के विकारों को न हरा दे। राम बाहर से तीर चलाने नहीं आएंगे, राम का मतलब हमारे अंदर का विवेक, हमारी सही समझ और हमारा धर्म है। जब तक हमारे भीतर का विवेक हमारे अहंकार का वध नहीं करता, तब तक ये सारे जश्न सिर्फ दिखावा हैं।
कल सिर्फ रावण का पुतला नहीं जला, बल्कि हमें यह सोचने का कड़वा मौका मिला है कि हम अपनी संस्कृति को किस दिशा में ले जा रहे हैं। त्यौहार हमें सुधारने के लिए आते हैं, न कि सिर्फ मनोरंजन के लिए। रावण कोई और नहीं, हमारे अंदर का विकार है और राम कोई और नहीं, हमारे अंदर की अच्छाई है। जिस दिन हमने अपने अंदर के अहंकार और लालच को जला दिया, समझ लीजिए कि उसी दिन असली विजयदशमी होगी।
बाकी भाई, आप लोगों की इस बारे में क्या राय है..? क्या हम अपनी संस्कृति को सिर्फ मनोरंजन और दिखावा बनाकर नहीं रख चुके हैं..? अपने विचार कमेंट्स में ज़रूर लिखिएगा!
✍️ साभार
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