सोचने वाली बात है - भगवती के पंडाल में घुसने और गरबा पंडाल में जाने के लिए मुस्लिम लड़के इतने लालायित क्यों रहते हैं? क्या आपने कभी मुस्लिम लड़कियों को गरबा करने के लिए इतना उत्सुक देखा है? नहीं देखा होगा।
अब दोगलेपन की पराकाष्ठा देखिए -
जहाँ वंदे मातरम में माँ भगवती के ही रूपों - दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती - की वंदना की कुछ पंक्तियाँ आती हैं, तो पूरा वंदे मातरम ही गैर-इस्लामिक हो जाता है। उसे गाने से मजहब खतरे में पड़ जाता है, फतवे निकल आते हैं। ..और वहीं दूसरी तरफ, जहाँ साक्षात भगवती का विग्रह स्थापित है, जहाँ माँ को प्रसन्न करने के लिए गरबा किया जा रहा है, वहाँ जाना, वहाँ घुसना, वहाँ नाचना गैर-इस्लामिक नहीं लगता? वहाँ मजहब को कोई खतरा नहीं होता?
मतलब माँ की स्तुति गाना हराम है, लेकिन माँ के दरबार में जाकर हुड़दंग करना हलाल है?ये श्रद्धा नहीं है, ये आस्था नहीं है, ये शुद्ध थेथरई है और इस थेथरई को पहचानना बहुत जरूरी है। कोई महा मूर्ख ही होगा जो इस मजहबी मानसिकता की गंदगी को अब भी न समझ पा रहा हो

