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# गुरु पूर्णिमा पर एक चिंतन: क्या संस्कार पीछे छूट रहे हैं? Gen Z और भाषा की मर्यादा
आज गुरु पूर्णिमा है। यह दिन केवल औपचारिक रूप से किसी के आगे सिर झुकाने का नहीं, बल्कि अपने जीवन, अपनी वाणी और अपनी संस्कृति का अवलोकन करने का दिन है। गुरु हमें अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं, लेकिन आज हमें खुद से एक कड़वा सवाल पूछना होगा: क्या आज की हमारी युवा पीढ़ी (Gen Z, उम्र 15 से 25 वर्ष) सही दिशा में जा रही है?
आज स्थिति यह हो गई है कि 15 से 25 साल के युवाओं के लिए अपशब्दों (गालियों) का प्रयोग करना एक आम बात, यहाँ तक कि एक 'कूल' ट्रेंड बन गया है। सभ्यता और संस्कारों की जगह एक अजीब सी आक्रामकता ने ले ली है।
### वाणी का गिरता स्तर:
घर की चौखट तक पहुँची गालियाँ
एक दौर था जब युवा दोस्तों के बीच भले ही कुछ अपशब्द बोल लेते थे, लेकिन घर की चौखट पर कदम रखते ही वाणी में मर्यादा और सम्मान लौट आता था। 2000 या 2010 के दशक के युवाओं ने भी अपनी जवानी देखी है, लेकिन तब घर के बड़ों, माता-पिता और समाज के सामने एक पर्दा था—एक 'लिहाज' था।
आज वह सीमा रेखा पूरी तरह से मिट चुकी है।
* 'थैंक यू' और 'सॉरी' जैसे सामान्य शिष्टाचार के शब्द बोलने में आज के युवाओं को झिझक या शर्म महसूस होती है।
* वहीं दूसरी ओर, अंग्रेज़ी के अभद्र शब्द जैसे *'Fuck you'*, *'Sweet'*, *'Fuck off'*, *'Asshole'* जैसे शब्द अब केवल दोस्तों के बीच नहीं, बल्कि घर में माता-पिता के सामने और सार्वजनिक स्थानों पर बेझिझक बोले जा रहे हैं।
यह केवल भाषा की गिरावट नहीं है, यह इस बात का संकेत है कि हमारी आने वाली पीढ़ी मानसिक और सांस्कृतिक रूप से कहाँ जा रही है।
### आखिर क्यों हुआ ऐसा?
समस्या की जड़ क्या है?
सोशल मीडिया और इंटरनेट ने युवाओं को एक ऐसा मंच दे दिया है जहाँ वे अपनी भड़ास, गुस्सा और कुंठा बिना किसी रोक-टोक के निकाल रहे हैं। लेकिन इंटरनेट तो केवल एक माध्यम है, असली कारण कुछ और है:
**संस्कारों का अभाव और अपने धर्म व जड़ों से दूरी।**
जब हम दूसरे समुदायों या धर्मों के युवाओं को देखते हैं, तो पाते हैं कि वे अपने धर्म की बुनियादी तालिमों, प्रार्थनाओं और परंपराओं से मज़बूती से जुड़े रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, अन्य धर्मों के युवाओं में अपनी धार्मिक पहचान और भाषा की मर्यादा को लेकर एक स्पष्ट अनुशासन दिखाई देता है। वे सार्वजनिक रूप से या घर में इस तरह की अभद्रता से बचते हैं।
फिर हमारे बच्चों में यह भटकाव क्यों?
क्योंकि हमने उन्हें आधुनिक तकनीक तो दे दी, लेकिन अपनी सनातन परंपराओं, नीति-शास्त्रों और जीवन मूल्यों से जोड़ना भूल गए।
### समाधान क्या है? युवाओं को सही मार्ग पर कैसे लाएं?
गुरु पूर्णिमा का यही संदेश है कि भटके हुए को सही राह दिखाई जाए। इस समस्या का समाधान बच्चों को डांटने या केवल कोसने में नहीं, बल्कि उन्हें पुनः अपनी संस्कृति से जोड़ने में है:
1. **धार्मिक व नैतिक शिक्षा का पुनर्जागरण:**
बच्चों को बचपन से ही प्रभु श्री राम के चरित्र, श्री हनुमान जी की सेवा-भावना और विनम्रता के बारे में बताएं। उन्हें केवल कहानियों की तरह नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला के रूप में यह सिखाएं।
2. **हनुमान चालीसा और नित्य प्रार्थना:**
घर में ऐसा माहौल बनाएं जहाँ बच्चे रोज़ हनुमान चालीसा का पाठ करें या अपने धर्मग्रंथों के संपर्क में आएं। प्रार्थना मन को शांत करती है, वाणी में मिठास लाती है और व्यक्ति को अनुशासित बनाती है।
3. **माता-पिता का आचरण और संवाद:**
माता-पिता को अपने घर का माहौल ऐसा बनाना होगा जहाँ संवाद तो हो, लेकिन मर्यादा की बलि न चढ़े। बच्चों को यह समझाना होगा कि अभद्र भाषा बोलना किसी 'कूल' होने की निशानी नहीं, बल्कि मानसिक दुर्बलता का प्रतीक है।
4. **कृतज्ञता और क्षमा की आदत ('थैंक्स' और 'सॉरी'):**
घर से ही बच्चों में झिझक मिटाएं कि अपनी गलती पर 'सॉरी' कहना और किसी की मदद पर 'थैंक यू' या 'धन्यवाद' बोलना बड़प्पन की निशानी है, कमजोरी की नहीं।
### आज ही से संकल्प लें
इस गुरु पूर्णिमा पर, सभी माता-पिता और युवा यह संकल्प लें कि हम तकनीक और आधुनिकता को अपनाएंगे, लेकिन अपनी सभ्यता और मर्यादा की कीमत पर नहीं।
वाणी ही व्यक्ति के चरित्र का दर्पण होती है।
आइए, अपनी युवा पीढ़ी को फिर से श्री राम की मर्यादा और हनुमान जी की विनम्रता से जोड़ें, ताकि हमारा समाज न केवल बौद्धिक रूप से, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त बन सके।
साभार
डॉ पंडित नलिन शर्मा 9179271166
मां पीतांबरा ज्योतिष केंद्र उज्जैन
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