पहले घटना होती है, पीड़ित की आवाज दबाने की कोशिश शुरू हो जाती है। मामले की गर्मी अभी बरकरार होती है कि सारा रुख पलट दिया जाता है। पीड़ित पर ही सवाल उठाए जाते हैं, और आरोपी को victim का रूप दे दिया जाता है। चाहे छेड़खानी की घटना हो, मॉलेस्टेशन का मामला हो, या कोई और गंभीर अपराध जब पीड़ित हिंदू होता है, तो जांच शुरू होने से पहले ही पूरी कहानी को घुमा दिया जाता है। आरोपी को बेचारा बताकर ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है।
ये कोई नई बात नहीं, बल्कि पुरानी रणनीति है: पहले हमला या अपराध करो, फिर पीड़ित पर आरोप लगा दो, और अंत में victim card खेलकर चर्चा का रुख मोड़ दो।जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी या बेगुनाह घोषित करना न सिर्फ तथ्यों का अपमान है, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है। सच्चाई सामने आने तक संयम बरतना चाहिए, लेकिन कुछ लोग तो सच्चाई को दबाने में ही लगे रहते हैं। जबकी सच सबके सामने होता है

