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🔏 लेखक : पंकज सनातनी
अखंड भारत का मतलब कोई पुरानी लकीर या सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह पाँच हज़ार साल से बहती आ रही एक सोच है, एक जीने का तरीका है, जो आज भी हमारी साँसों में चलता है। जब दुनिया के कई देश बने भी नहीं थे, तब सरस्वती और सिंधु के किनारे हमारे शहर बस रहे थे। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, लोथल, राखीगढ़ी जैसे नगर 2600 साल ईसा पूर्व में ही इतने सलीके से बने थे कि वहाँ की चौड़ी सड़कें, पक्के मकान, ढकी नालियाँ, सार्वजनिक स्नानागार और अन्न के गोदाम देखकर आज के इंजीनियर भी दंग रह जाते हैं। लोथल में दुनिया का सबसे पुराना गोदीबाड़ा मिला है जहाँ से हमारे व्यापारी मिस्र और मेसोपोटामिया तक सामान भेजते थे। खास बात यह कि उस समय कश्मीर से कन्याकुमारी तक बाट और माप एक जैसे थे। एक ही तराजू, एक ही नियम। यह एकता थी विचार की, व्यापार की, जीवन की।
हमारी नदियाँ केवल पानी नहीं देतीं, हमारा इतिहास भी लिखती हैं। ऋग्वेद में सरस्वती नदी का जिक्र 50 से ज्यादा बार हुआ है। उसे नदियों में सबसे श्रेष्ठ कहा गया। आज वह नदी जमीन पर नहीं दिखती पर ISRO के सैटेलाइट और वैज्ञानिकों की खोज बताती है कि हरियाणा, राजस्थान से होकर सच में एक बहुत बड़ी नदी बहती थी जो लगभग 2000 साल ईसा पूर्व सूख गई। उसके किनारे भिरड़ाना, कालीबंगन जैसे गाँव बसे थे। यानी हमारे वेद कोई कपोल कल्पना नहीं, उस समय का भूगोल और विज्ञान भी हैं। इसी धरती पर ऋषियों ने कहा कि सारी दुनिया एक परिवार है, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’। बोले कि सब तरफ से अच्छे विचार आने दो, ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’। हमने दरवाजे बंद नहीं किए, दिमाग के खिड़की दरवाजे खोलकर रखे।
इसी खुलेपन ने तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय दिए। तक्षशिला में चाणक्य राजनीति पढ़ाते थे, जीवक वैद्य बनना सिखाते थे, पाणिनि ने व्याकरण के 4000 नियम बना दिए जो आज भी कंप्यूटर की भाषा में काम आते हैं। नालंदा में दस हज़ार छात्र बिना फीस पढ़ते थे। चीन, कोरिया, तिब्बत, फारस से लोग यहाँ पढ़ने आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने लिखा कि नालंदा में दाखिला बहुत कठिन था। पहले दरवाजे पर बैठे पंडित से शास्त्र पर बहस जीतनी पड़ती थी। वहाँ गणित, खगोल, दवाई, धातु, तर्क, सब एक साथ पढ़ाया जाता था। जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा की लाइब्रेरी ‘धर्मगंज’ जलाई तो वह तीन महीने तक जलती रही। किताबें राख हो गईं पर ज्ञान के बीज बच गए। वही बीज तिब्बत और चीन चले गए। आज भी वहाँ हमारे सैकड़ों ग्रंथ सुरक्षित हैं जो भारत में नहीं मिलते।
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हमने दुनिया को शून्य दिया। शून्य और दशमलव के बिना आज का मोबाइल, कंप्यूटर, रॉकेट कुछ भी नहीं चल सकता। आर्यभट ने 499 ईस्वी में बता दिया था कि धरती गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है, इसी से दिन रात होते हैं। उन्होंने पाई की कीमत 3.1416 निकाली। वराहमिहिर ने भूकंप के लक्षण और बादलों के प्रकार लिखे। भास्कराचार्य ने न्यूटन से 500 साल पहले ही गुरुत्वाकर्षण समझा दिया। लिखा कि धरती में खींचने की ताकत है जिस कारण चीजें नीचे गिरती हैं।
डॉक्टरी में भी हम दुनिया के गुरु थे। सुश्रुत को सर्जरी का पिता कहते हैं। उन्होंने 300 तरह की सर्जरी और 120 तरह के औजार का वर्णन किया। नाक की प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद का ऑपरेशन, पथरी निकालना, ये सब उन्होंने 2600 साल पहले कर दिखाया। चरक ने कहा पहले बीमारी को ठीक से पहचानो फिर दवा दो। यही आज के डॉक्टर का पहला नियम है। नागार्जुन ने धातु और रसायन पर काम किया। दिल्ली का लोह स्तंभ 1600 साल से खुले में खड़ा है पर उसमें जंग नहीं लगी। यह हमारे पुरखों के धातु विज्ञान का सबूत है।
राज-काज में भी हम आगे थे। चंद्रगुप्त मौर्य का राज अफगानिस्तान से असम और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला था। चाणक्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा कि राजा टैक्स कैसे ले, जासूस कैसे रखे, बाढ़-सूखा में जनता को कैसे बचाए। अशोक के शिलालेख अफगानिस्तान से कर्नाटक तक मिलते हैं। एक भाषा, एक लिपि, एक शासन। गुप्त काल को सोने का युग कहते हैं। समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा पर वह वीणा भी बजाता था। उसी समय कालिदास ने मेघदूत लिखा, आर्यभट ने तारे नापे। चोल राजाओं की नौसेना श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया तक गई। अंगकोर वाट का विष्णु मंदिर और बोरोबुदुर का बुद्ध मंदिर हमारे व्यापारियों और कारीगरों की निशानी हैं। हमने तलवार से नहीं, ज्ञान और व्यापार से दुनिया को जोड़ा।
अब आज को देखिए। जिस देश ने शून्य दिया वह आज डिजिटल पेमेंट में दुनिया में नंबर एक है। UPI से हर महीने 18 अरब से ज्यादा बार पैसा भेजा जाता है। दुनिया में फोन से जितना तुरंत पेमेंट होता है उसका लगभग आधा अकेले भारत में होता है। जिस देश ने सुश्रुत पैदा किया वह आज दुनिया की फार्मेसी है। दुनिया की 60 प्रतिशत वैक्सीन भारत बनाता है। कोरोना में हमने 100 देशों को 30 करोड़ से ज्यादा खुराक मुफ्त दी। इसे ‘वैक्सीन मैत्री’ कहा गया। जिस देश ने योग दिया उसकी बात आज 190 देश मानते हैं। हर 21 जून को पूरी दुनिया योग करती है। संयुक्त राष्ट्र में यह प्रस्ताव रिकॉर्ड 177 देशों के समर्थन से पास हुआ था।
अंतरिक्ष में हमने नाम कमाया। चंद्रयान-3 चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला दुनिया का पहला यान बना। मंगलयान पहले ही प्रयास में मंगल पहुँच गया। खर्च सिर्फ 450 करोड़, हॉलीवुड की फिल्म से भी कम। अब आदित्य L1 सूरज को पढ़ रहा है और गगनयान से हम अपना आदमी अंतरिक्ष भेजने वाले हैं। यह वही तारा देखने की परंपरा है जो आर्यभट से शुरू हुई थी।
पैसों की बात करें तो 1947 में दुनिया की कुल कमाई में हमारा हिस्सा 3 प्रतिशत बचा था। 1700 में यह 24 प्रतिशत था। आज हम 4 लाख करोड़ डॉलर के साथ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। 2027 तक तीसरे नंबर पर पहुँचने की उम्मीद है। 2014 में भारत में सिर्फ 2 मोबाइल फैक्ट्री थीं, आज 200 से ज्यादा हैं। हम दुनिया में दूसरे सबसे बड़े मोबाइल बनाने वाले हैं। 2014 में 18 हज़ार गाँव में बिजली नहीं थी, आज हर गाँव में बिजली पहुँच गई है। 4.6 करोड़ घरों में नल से पानी आता था, आज 15 करोड़ से ज्यादा घरों में नल लग चुका है। 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, 50 करोड़ लोगों को 5 लाख तक का मुफ्त इलाज आयुष्मान कार्ड से, 12 करोड़ घरों में शौचालय, 10 करोड़ बहनों को उज्ज्वला का गैस सिलेंडर मिला है।
पर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। यही चिंता की बात है। नालंदा में मुफ्त और ऊँची पढ़ाई थी, पर आज गाँव के आधे बच्चे पाँचवीं में जाकर भी दूसरी की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते। यह ASER 2023 की रिपोर्ट कहती है। हम नई खोज पर बहुत कम खर्च करते हैं। अपनी कमाई का सिर्फ 0.65 प्रतिशत, जबकि चीन 2.4 प्रतिशत और अमेरिका 3.4 प्रतिशत लगाता है। दुनिया की टॉप 100 यूनिवर्सिटी में आज भी एक भी भारतीय यूनिवर्सिटी नहीं है।
सेहत में भी कमी है। WHO कहता है 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए, हमारे यहाँ 1456 लोगों पर 1 डॉक्टर है। 5 साल से छोटे 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण छोटे कद के रह जाते हैं। यह तब है जब चरक ने कहा था कि भोजन ही सबसे बड़ी दवा है। पानी की हालत खराब है। नीति आयोग कहता है कि 2030 तक 21 शहरों में जमीन के नीचे का पानी खत्म हो सकता है। 70 प्रतिशत नदी तालाब का पानी गंदा है। हम नदियों को माँ कहते हैं पर वही माँ आज बीमार है।
समाज में भी दरार दिखती है। जिस देश ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ कहा, वहाँ कभी भाषा, कभी जाति, कभी धर्म के नाम पर झगड़ा हो जाता है। NCRB की रिपोर्ट बताती है कि ऐसे मामले कम नहीं हो रहे। सोशल मीडिया पर झूठी खबर और नफरत बहुत तेजी से फैलती है। हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा है। 2024 के चुनाव में 97 करोड़ लोग वोटर थे। पर संसद में अक्सर हंगामा होता है, बहस कम हो पाती है।
पर्यावरण में हमने वादा किया है कि 2030 तक 500 गीगावाट बिजली सूरज, हवा और पानी से बनाएँगे और 2070 तक प्रदूषण शून्य करेंगे। आज हम सौर ऊर्जा में दुनिया में चौथे नंबर पर हैं। पर दूसरी तरफ दुनिया के 100 सबसे गंदे शहरों में 63 भारत के हैं। दिल्ली लगातार चौथे साल दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी रही। यह तब है जब अथर्ववेद कहता है कि धरती हमारी माँ है और हम उसके बच्चे।
आज भारत दुनिया का सबसे जवान देश है। हमारी औसत उम्र 28.7 साल है। हर महीने 10 लाख नए लड़के लड़कियाँ काम ढूँढने निकलते हैं। यह बहुत बड़ा मौका है। अगर इनको सही हुनर और रोजगार मिल गया तो देश रॉकेट की तरह आगे बढ़ेगा। नहीं मिला तो यही ताकत बोझ बन जाएगी। सरकार स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया चला रही है। आज हमारे पास 110 से ज्यादा यूनिकॉर्न कंपनियाँ हैं। स्टार्टअप में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं। पर फैक्ट्री में नौकरी अभी धीरे बढ़ रही है। खेती में 45 प्रतिशत लोग लगे हैं पर कमाई में खेती का हिस्सा सिर्फ 18 प्रतिशत है।
तो अखंड भारत का आज मतलब क्या है। मतलब यह कि कश्मीर का केसर और कन्याकुमारी का नारियल एक ही थाली में इज्जत पाए। तमिल के तिरुवल्लुवर और कबीर का दोहा एक ही क्लास में पढ़ाया जाए। IIT का छात्र कोड भी लिखे और गीता भी समझे। पुजारी मंत्र भी पढ़े और कंप्यूटर भी चलाए। जब केरल का शंकराचार्य चारों कोनों में मठ बनाता है, जब असम का शंकरदेव और गुजरात का नरसिंह मेहता एक ही कृष्ण को गाते हैं, तो वही असली अखंडता है।
हमें याद रखना होगा कि हम गिरे बहुत बार पर हर बार उठे भी। सोमनाथ 17 बार टूटा, 17 बार बना। नालंदा जला पर तक्षशिला की सोच नहीं मरी। अंग्रेज गए 75 साल हुए, हमने गरीबी बहुत घटाई, पर मंजिल अभी दूर है।
इसलिए 5000 साल का इतिहास सिर्फ छाती फुलाने के लिए नहीं है। वह आईना है। जो शून्य दिया, उससे आगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनाना है। जो आयुर्वेद दिया, उसे लैब में साबित करके दुनिया को देना है। जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ कहा, उसे G20 में बोलकर ही नहीं, अपने पड़ोसियों से रिश्ता सुधारकर निभाना है। जो नालंदा था, वैसी यूनिवर्सिटी फिर बनानी है।
अखंड भारत न नक्शा है, न नारा। यह हमारा खुद से वादा है। वादा कि हम ज्ञान में एक रहेंगे, मेहनत में एक रहेंगे, ईमानदारी में एक रहेंगे और एक दूसरे की इज्जत में एक रहेंगे। अगर यह कर लिया तो सरस्वती के किनारे जन्मी यह सभ्यता की नदी फिर से पूरी दुनिया को रास्ता दिखाएगी। तब 5000 साल का गौरव सिर्फ किताब की बात नहीं रहेगा, वह आने वाले 5000 साल की नींव बन जाएगा। और यही हम सबकी जिम्मेदारी है, आज, अभी।
*⏳ निष्कर्ष :—* आज सोचकर दिल भर आता है कि जिस धरती ने दुनिया को शून्य, योग, आयुर्वेद और नालंदा जैसा रोशनी का मंदिर दिया, जहाँ ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात कहकर पूरी दुनिया को अपना परिवार माना गया, उसी धरती पर आज भी बच्चा भूखा सोता है, नदी मैली बहती है, और भाई भाई को जाति-भाषा के नाम पर बाँटने की कोशिश करता है। सरस्वती सूख गई, नालंदा जल गया, सोमनाथ बार बार टूटा, पर हर बार हमारी आत्मा ने उसे फिर से जोड़ा। आज भी हम चंद्रयान से चाँद छू रहे हैं पर जमीन पर खड़े किसान की आँख में आँसू हैं, UPI से अरबों का लेनदेन हो रहा है पर हुनर के बिना नौजवान खाली हांथ है। सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं हम अपनी जड़ों को भूल न जाएँ, कहीं फिर से गुलामी की जंजीरें ज्ञान के अभाव में न पड़ जाएँ। अगर अब भी नहीं जागे, अब भी दिलों को नहीं जोड़ा, अब भी किताब और कर्म को साथ नहीं लाए, तो पाँच हज़ार साल का यह दीया बुझते देर नहीं लगेगी। अखंड भारत रोएगा, और आने वाली पीढ़ी हमसे सवाल पूछेगी कि इतना सब देकर भी तुम हमें क्या दे गए। समय कम है, दर्द बड़ा है, उठो, जुड़ो, पढ़ो और गढ़ो, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
✍️ साभार
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