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_"अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।_
_चत्वारि तस्य वर्धन्ते — आयुर्विद्या यशो बलम्॥"_
अर्थात— जो व्यक्ति नित्य अपने से बड़ों का सम्मान करता है, उनके झुककर चरण स्पर्श करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। और यही हमारी सनातन संस्कृति की आत्मा है।
आज का आधुनिक समाज भले ही चरण स्पर्श को केवल एक" Formal Gesture" मानता हो, लेकिन सनातन धर्म में चरण स्पर्श केवल परंपरा नहीं, बल्कि ऊर्जा, विनम्रता, संस्कार और आध्यात्मिक आदान-प्रदान का माध्यम माना गया है।
जब कोई व्यक्ति श्रद्धा से किसी श्रेष्ठ, गुरुजन, माता-पिता, संत या बुजुर्ग के चरण स्पर्श करता है, तब वह केवल शरीर नहीं झुकाता बल्कि वह अपने अहंकार को झुकाता है। और जहां अहंकार समाप्त होता है, वहीं से संस्कार प्रारंभ होते हैं।
📖 शास्त्रों में चरण वंदना को अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है।
भगवान श्रीराम प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर माता कौशल्या, पिता दशरथ एवं गुरुजनों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते थे। भगवान श्रीगणेश जी ने भी सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने के स्थान पर अपने माता-पिता की परिक्रमा कर यह सिद्ध किया कि माता-पिता ही समस्त देवताओं के समान हैं।
सनातन धर्म में कहा गया है कि— "माता-पिता और गुरु के चरणों में ही स्वर्ग बसता है।"
परंतु क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों में कुछ परिस्थितियों और कुछ संबंधों में चरण स्पर्श को वर्जित भी बताया गया है…? क्योंकि सनातन धर्म केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि मर्यादा, ऊर्जा और धर्म नियमों पर आधारित है। तो आइए जानते हैं शास्त्रों के अनुसार किन लोगों के पैर नहीं छूने चाहिए।
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(क) कुंवारी कन्या के पैर नहीं छूवाने चाहिए।
शास्त्रों में कन्या को "देवी स्वरूपा" कहा गया है। नवरात्रि में जिन कन्याओं की पूजा की जाती है, उन्हें सामान्य बालिका नहीं बल्कि माँ आदिशक्ति का रूप माना जाता है। इसीलिए कुंवारी कन्याओं को किसी के पैर नहीं छूने चाहिए। यदि कोई छोटी कन्या आपके पैर छूने आए तो प्रेमपूर्वक उसे रोक देना चाहिए। बल्कि शास्त्र कहते हैं कि कन्याओं का आशीर्वाद लेना चाहिए।
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(ख) बेटियों से पैर नहीं छुआने चाहिए।
बेटियां घर की लक्ष्मी मानी जाती हैं। और जिस घर में बेटियों का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है। किसी पिता को अपनी पुत्री से पैर नहीं छुआने चाहिए। यदि बेटी पैर छुए तो उसे स्नेहपूर्वक आशीर्वाद दें, परंतु स्वयं चरण स्पर्श न करवाएं। क्योंकि सनातन धर्म में बेटियाँ केवल संतान नहीं बल्कि "कुल की देवी" मानी गई है।
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(ग) बहुएं घर की लक्ष्मी होती हैं।
बहू केवल घर की सदस्य नहीं होती, वह उस घर में लक्ष्मी स्वरूप प्रवेश करती है। इसीलिए कई परंपराओं में बहुएं अपनी सास के चरण स्पर्श करती हैं, लेकिन श्वसुर के नहीं। हालांकि विभिन्न समाजों में परंपराएं अलग हो सकती हैं, परंतु मूल भावना यही है कि स्त्री का सम्मान बना रहे।
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(घ) मंदिर में किसी के पैर नहीं छूने चाहिए।
यदि मंदिर में कोई बड़ा व्यक्ति, गुरु या सम्मानित व्यक्ति मिल जाए, तब भी सबसे पहले भगवान को प्रणाम करना चाहिए। क्योंकि मंदिर में भगवान से बड़ा कोई नहीं होता। भगवान के समक्ष किसी अन्य व्यक्ति के चरण स्पर्श करना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है। इसलिए पहले ईश्वर को नमन करें, फिर बाहर आकर बड़ों का सम्मान करें।
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(ड़) पूजा कर रहे व्यक्ति के पैर नहीं छूने चाहिए।*)
जब कोई व्यक्ति पूजा, जप, ध्यान या आराधना में बैठा हो, तब उसके चरण स्पर्श नहीं करने चाहिए। क्योंकि उस समय उसकी चेतना ईश्वर से जुड़ी होती है। ऐसे में चरण स्पर्श करने से उसकी साधना में बाधा उत्पन्न होती है और पूजा का प्रभाव भी कम होता है। शास्त्र कहते हैं— पूजा के समय व्यक्ति को Disturb करना अनुचित है।
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(च) सोए हुए व्यक्ति के पैर नहीं छूने चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति सो रहा हो या लेटा हुआ हो, तब उसके चरण स्पर्श नहीं करने चाहिए। सनातन मान्यता के अनुसार इससे उस व्यक्ति की आयु और ऊर्जा प्रभावित होती है। केवल दिवंगत व्यक्ति के ही चरण अंतिम बार स्पर्श किए जाते हैं। इसीलिए जीवित व्यक्ति के चरण सदैव जागृत अवस्था में ही स्पर्श करने चाहिए।
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(छ) श्मशान से लौटे व्यक्ति के पैर नहीं छूने चाहिए।
अंतिम संस्कार से लौटने के बाद व्यक्ति अशुद्ध माना जाता है। इसलिए उस समय उसके चरण स्पर्श नहीं करने चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि स्नान और शुद्धि के बाद ही पुनः सामान्य व्यवहार करना चाहिए। श्मशान में भी किसी के चरण स्पर्श करना वर्जित माना गया है।
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(ज) अशुद्ध अवस्था में चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।
यदि आप स्वयं अशुद्ध हैं अथवा जिसके चरण स्पर्श करने जा रहे हैं वह अशुद्ध अवस्था में है, तब चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। सनातन धर्म में शारीरिक ही नहीं, मानसिक और ऊर्जात्मक शुद्धता का भी विशेष महत्व है।
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(झ) भांजा-भांजी पूजनीय माने गए हैं।
सनातन परंपरा में भांजा और भांजी को विशेष सम्मान प्राप्त है। अर्थात उन्हें पूजनीय माना गया है। इसीलिए भांजे-भांजी को मामा-मामी के चरण नहीं छूने चाहिए। ऐसा करना शास्त्रों के अनुसार उचित नहीं माना गया है।
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(ञ) पति को पत्नी के पैर नहीं छूने चाहिए।
पति-पत्नी का संबंध समानता, प्रेम, समर्पण और साझेदारी का संबंध है। शास्त्रों में पति द्वारा पत्नी के चरण स्पर्श को उचित नहीं माना गया। क्योंकि गृहस्थ जीवन में दोनों एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं, सेवक और स्वामी नहीं। हाँ, पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान अवश्य करें— यही सनातन की वास्तविक शिक्षा है।
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📜 निष्कर्ष :— सनातन धर्म हमें केवल चरण स्पर्श करना नहीं सिखाता, बल्कि यह भी सिखाता है कि सम्मान, मर्यादा और धर्म के नियमों का पालन कैसे किया जाए। चरण स्पर्श का उद्देश्य केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को त्यागकर बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करना है।
किन्तु शास्त्र यह भी बताते हैं कि हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में चरण स्पर्श उचित नहीं होता। जहाँ चरण स्पर्श से सम्मान, संस्कार और सद्भाव बढ़ता है, वहीं अनुचित समय या अनुचित व्यक्ति के चरण स्पर्श से धर्म मर्यादा का उल्लंघन भी हो सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं का केवल पालन ही न करें, बल्कि उनके पीछे छिपे शास्त्रीय ज्ञान, मर्यादा और आध्यात्मिक संदेश को भी समझें। क्योंकि जिस समाज में माता-पिता का सम्मान, गुरुजनों का आदर, स्त्रियों का गौरव और धर्म की मर्यादाएँ जीवित रहती हैं, वही समाज सदैव समृद्ध, संस्कारी और शक्तिशाली बना रहता है।
याद रखिए— "चरण स्पर्श केवल शरीर का झुकना नहीं, बल्कि अहंकार का झुकना है; और जहाँ अहंकार झुकता है, वहीं से संस्कारों का उदय होता है।"
यदि हम अपने बच्चों को धन-दौलत से पहले संस्कार देना सीख जाएँ, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वयं धर्म, परिवार और राष्ट्र का गौरव बन जाएँगी।
जयतु सनातन धर्म 🚩
जयतु सनातन संस्कृति 🚩
✍️ साभार
🔏 लेखक : पंकज सनातनी
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