अमिताभ अग्निहोत्री जी (@Aamitabh2) ने एक ऐसा सच पटक दिया है कि सेकुलर गैंग का दिमाग चकरा जाए! तो तैयार हो जाइए, क्योंकि ये आपको इतिहास की उस गहरी खाई में ले जाएगा, जहां से सच चीख-चीखकर बाहर निकल रहा है!
संविधान कहाँ था, जब गांधी जी की हत्या हुई?"30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या की। 15 नवंबर 1949 को अंबाला केंद्रीय कारागार में फांसी दे दी गई। जबकि 26 नववबर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को स्वीकार किया और 26 जनवरी 1950 से देश में लागू हुआ। गांधी जी और गोडसे के समय में संविधान था ही कहाँ जो उसके विरोध या समर्थन का प्रश्न उठता?"
ये लाइनें सुनकर तो लगता है जैसे इतिहास की एक बड़ी चाल सामने आ गई हो! दोस्तों, सोचिए गांधी जी की हत्या 1948 में हुई, गोडसे को फांसी 1949 में हो गई, और संविधान तो 1950 में लागू हुआ। मतलब साफ है - उस वक्त देश में कोई संविधान नहीं था, जो गोडसे के कृत्य को "संवैधानिक" नजरिए से आंक सके।
फिर ये सवाल कौन उठाता है कि गोडसे ने संविधान का विरोध किया या समर्थन? ये तो वही बात हुई कि बिना कोर्ट के किसी को सजा सुना दो और कहो कि "कानून के खिलाफ गया"!
हड़बड़ी में दी गई फांसी: सच दबाने की साजिश?
अब बात करते हैं फांसी की। गोडसे और उनके साथी नारायण आप्टे को महज एक साल से भी कम समय में फांसी दे दी गई। हरियाणा प्रिजन रिकॉर्ड्स और उस दौर के दस्तावेज चीख-चीखकर कहते हैं कि ये फांसी हड़बड़ी में दी गई। क्यों? क्योंकि गहरी जांच होने का डर था।होम मिनिस्टर सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मामले को जल्दी निपटाने का फैसला लिया, ताकि साजिश के पीछे के असली चेहरों पर पर्दा पड़ जाए।
गांधी जी के बेटों, मनिलाल और रामदास गांधी, ने दया याचिका दायर की थी, लेकिन नेहरू, पटेल और राजगोपालाचारी ने उसे ठुकरा दिया। सवाल उठता है - आखिर इतनी जल्दी क्यों? क्या सच को दबाने की कोशिश थी?
इतिहास का वो काला सच
दोस्तों, गांधी जी की हत्या के पीछे की कहानी उतनी साफ नहीं है, जितनी हमें स्कूल की किताबों में पढ़ाई गई। नाथूराम गोडसे एक हिंदूवादी कार्यकर्ता था, जिसका रिश्ता आरएसएस और हिंदू महासभा से था। लेकिन आरएसएस ने बाद में खुद को इससे अलग कर लिया। गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने तो खुलेआम कहा कि वे सभी भाई उस वक्त आरएसएस में थे। फिर ये पलट-पलट क्यों? क्या ये डर था कि सच सामने आ जाए कि हत्या के पीछे एक संगठित सोच थी?गांधी जी की हत्या के बाद RSS पर बैन लगा, लेकिन कोर्ट ने बाद में इसे हटा दिया। ये सारा खेल इतना उलझा हुआ है कि लगता है जैसे इतिहास को जानबूझकर तोड़ा-मरोड़ा गया।और वो भी किसके इशारे पर? सेकुलरिज्म के ठेकेदारों ने तो गांधी जी को "महात्मा" बनाकर एक मूर्ति गढ़ दी, लेकिन उनके जीवन के काले अध्याय - जैसे ब्रह्मचर्य प्रयोग - को जानबूझकर दबा दिया गया।
संविधान और गांधी: क्या था असली रिश्ता?
अब संविधान की बात। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने इसे मंजूरी दी, और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। लेकिन गांधी जी तो 1948 में ही चले गए। तो सवाल उठता है - क्या संविधान में उनकी कोई भूमिका थी? या ये सब नेहरू और अम्बेडकर की देन थी, जिन्होंने गांधी के नाम पर अपनी दुकान सजाई? गांधी जी ने तो कभी संविधान की बात नहीं की थी। उनका फोकस था अहिंसा और ग्राम स्वराज। फिर ये "गांधीवादी संविधान" का ढोंग क्यों?
जागो, देशवासियों!
दोस्तों, ये हमें एक बड़ा सबक देती है। इतिहास को सिर्फ किताबों से न देखो, उसे खुद खोदकर देखो। गोडसे को फांसी देना आसान था, लेकिन सच को दबाना मुश्किल। हरियाणा के प्रिजन रिकॉर्ड्स, कोर्ट के दस्तावेज, और गवाहों के बयान - ये सब चीख रहे हैं कि हत्या के पीछे की कहानी अधूरी है। सेकुलर गैंग जो गांधी जी को भगवान बनाकर पूजता है, उसे ये सवालों का जवाब देना होगा।तो आइए, इस सनातन सच को सामने लाएं। हिस्ट्री रेसेट का वक्त आ गया है। सच को बेनकाब करने का वक्त! जागो, देशवासियों, और इतिहास को अपने हाथों से लिखो। क्योंकि सच कभी दब नहीं सकता, वो तो बस इंतजार करता है - सही वक्त का!

