टैरिफ वार की जानकारी तो हम सभी को है , हम जानते है कि किस तरह अमेरिका टैरिफ के नाम पर सबको डरा रहा था और भारत को भी धमकी दे रहा था , फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि भारत पर सबसे कम यानी 18% टैरिफ लगाया है ...ये समझने का विषय है। लग रहा है मानो विश्व की स्थिति बदल रही है और भारत का स्तर बढ़ रहा है।
पहले अमेरिका ने भारत को डराया लेकिन भारत डरा नहीं भारत झुका नहीं , भारत ने कूटनीति के साथ विश्व को अपनी महत्ता का परिचय कराया, चीन और रूस के साथ मिलकर और मदर ऑफ डील करके अमेरिका को आइना दिखा जिसके बाद जो परिणाम हुआ वो अब दुनिया के सामने है...टैरिफ 18%
ना झुके, ना टूटे: भारत की कूटनीतिक जीत , अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का फोन कॉल और उसके तुरंत बाद अमेरिकी टैरिफ़ में गिरावट, प्रधानमंत्री मोदी की "इंडिया फ़र्स्ट" नीति का सबसे बड़ा सबूत है। अमेरिका ने 50% टैरिफ़ को घटाकर 18% कर दिया है। यह कोई किस्मत का खेल या तुक्का नहीं था। यह जियो-पॉलिटिक्स की शतरंज थी, जिसमें नई दिल्ली ने बाज़ी मार ली है।
इस जीत ने टेक्सटाइल, खेती और ज्वेलरी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी को प्रभावित होने से बचा लिया है। इसने साबित कर दिया है कि हालात चाहे जैसे भी हों, भारत अपने लोगों की रक्षा करना जानता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर दिखा दिया कि जब सामने वाला आक्रामक हो, तो उसे कैसे संभालना है। चाहे गलवान की बर्फीली चोटियाँ हों या वॉशिंगटन का ज़बरदस्त दबाव, मोदी डटे रहे।
यह जीत उस वादे की याद दिलाती है जो मोदी ने पिछले साल अगस्त में किया था: भारत अपने किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। भारत ने अमेरिका हो या यूरोप, किसी भी महाशक्ति के आगे एक इंच भी ज़मीन नहीं छोड़ी।
उधर अमेरिकी पक्ष बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है कि हम रूसी तेल बंद कर देंगे या 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेंगे (अमेरिका का कुल निर्यात ही क़रीब 84 अरब डॉलर का है, तो भारत अचानक 500 अरब डॉलर का सामान कैसे खरीद लेगा, जैसा ट्रम्प दावा कर रहे हैं?)।
लेकिन भारत का जवाब बेहद शांत और गरिमापूर्ण रहा। हमने शोर-शराबे को नज़रंदाज़ किया और सिर्फ़ अपने मतलब की 'ट्रेड डील' पर ध्यान दिया। हमने अपने देश की गरिमा पर आँच नहीं आने दी और पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर निकले।
एक बात साफ़ समझ लीजिए। यह अमेरिका का कोई तोहफ़ा नहीं है। यह छूट इसलिए मिली क्योंकि भारत ने दबने से मना कर दिया। ट्रंप दबाव में इसलिए भी थे क्योंकि अंत में ऊँचा टैरिफ़ अमेरिकी जनता ही चुका रही थी।
हम उस "डेड इकोनॉमी" वाले ताने को नहीं भूले हैं और न ही बिना वजह लगाए गए टैरिफ़ को। हमें राहत मिली है, ठीक है, लेकिन हम इसके लिए बहुत ज़्यादा शुक्रगुज़ार नहीं हैं। हम इस डील को किसी एहसान की तरह नहीं, बल्कि अपनी ताकत और जिद्द की जीत के रूप में देखते हैं।
फिर भी, अनुभव कहता है कि थोड़ा संभलकर रहना ज़रूरी है। ट्रंप के राज में होने वाले सौदे काँच की तरह नाज़ुक होते हैं। उन्होंने दक्षिण कोरिया जैसे दोस्तों के साथ भी डील की और जब मन किया, फिर से टैरिफ़ बढ़ा दिए।
अभी जो समझौता हुआ है, उसकी पूरी जानकारी भी साफ़ नहीं है। यह अभी कोई पक्का फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट नहीं है। यह सिर्फ़ एक तरह का व्यापारिक युद्ध विराम लगता है, कोई लोहे की लकीर नहीं। हमें सतर्क रहना ही होगा। क्या पता दो हफ़्ते बाद उनका एक ट्वीट आए और सब कुछ फिर बदल जाए।
हमें इस कड़वी सच्चाई का भी सामना करना होगा कि सिर्फ़ टैरिफ़ कम कर देने से इतिहास नहीं मिट जाता। महीनों तक जो दादागीरी और दबाव बनाया गया, उसके घाव गहरे हैं। भारत-अमेरिका के बीच जो भरोसा टूटा है, वह रातों-रात नहीं जुड़ सकता। व्यापार फिर शुरू हो जाएगा, लेकिन रिश्तों पर जो खरोंच आई है, उसके निशान बाकी रहेंगे। पुराने वाली गर्मजोशी वापस लाने में अभी वक़्त, सब्र और एक-दूसरे के लिए इज़्ज़त की ज़रूरत होगी।
अमेरिकी दोस्ती की असली परीक्षा सिर्फ टैरिफ़ घटाने में नहीं, बल्कि भारत की जनता को सम्मान देने में है। अगर अमेरिका वाकई पार्टनरशिप चाहता है, तो उसे H-1B वीज़ा के नाम पर भारतीय टैलेंट को रोकना बंद करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता, हम इस जीत का जश्न मनाएँगे, लेकिन अपनी आँखें खुली रखेंगे।
संदेश साफ़ है: भारत सीना तान कर खड़ा है। हम कई देशों के साथी तो हो सकते हैं, लेकिन किसी के गुलाम नहीं।

