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*सवाल :* क्या आप ने कभी बुर्के वाली (मुस्लिम महिला) का डिलीवरी के वक्त जरूरत पड़ने पर किया जाने वाला सिजेरियन ऑपरेशन होते सुना है ?
भारत में पिछले कुछ वर्षों में सिजेरियन डिलीवरी (सी-सेक्शन) की दर तेजी से बढ़ी है। NFHS-5 (2019-2021) के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 21.5% बच्चे सिजेरियन से पैदा हुए, जो NFHS-4 (2015-16) के 17.2% से काफी अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिश है कि सिजेरियन की दर 10-15% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे ऊपर ज्यादातर मामलों में कोई अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ नहीं मिलता, बल्कि मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
लेकिन इस बढ़ोतरी के बीच एक गंभीर और चिंताजनक अंतर दिखता है— धार्मिक समुदायों के बीच।
विभिन्न अध्ययनों और NFHS-5 से निकले विश्लेषणों में देखा गया है कि हिंदू महिलाओं में सिजेरियन की दर मुस्लिम महिलाओं से आमतौर पर अधिक होती है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में हिंदू महिलाओं में यह दर 47% तक पहुंची, जबकि मुस्लिम महिलाओं में 38.7% रही। कर्नाटक जैसे राज्यों में भी हिंदू महिलाओं में 31.6% और मुस्लिमों में 28.3% का अंतर दर्ज किया गया। उत्तर-पूर्व और अन्य क्षेत्रों में भी हिंदू महिलाओं में सिजेरियन अधिक देखा गया, जबकि मुस्लिम महिलाओं में सामान्य (नॉर्मल) डिलीवरी की प्रवृत्ति मजबूत रही।
एक बात और हिंदु महिलाओं में प्रग्नेंसी से लेकर डिलीवरी तक पहले महीने से लेकर आखिरी समय तक इलाज चालू रहता है। जिससे उनके सामने आर्थिक समस्याएं भी आती है ?
*🤔 यह अंतर क्यों ?*
इसका मुख्य कारण सामाजिक-आर्थिक और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा है। सिजेरियन की दर सबसे ज्यादा प्राइवेट अस्पतालों में है— लगभग 47% तक, जबकि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 14%। प्राइवेट अस्पतालों में आर्थिक प्रोत्साहन, समय की कमी, और कभी-कभी अनावश्यक सर्जरी के दबाव के कारण यह दर बढ़ती है। हिंदू समुदाय में शिक्षा, शहरीकरण और आर्थिक स्थिति बेहतर होने से अधिक महिलाएं प्राइवेट सुविधाओं का इस्तेमाल करती हैं, जहां सिजेरियन की संभावना 3-4 गुना ज्यादा होती है। उच्च शिक्षा वाली, अमीर और शहरी महिलाओं में यह दर 40-50% तक पहुंच जाती है।
दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय में सामान्य डिलीवरी की दर अधिक रहती है। कई मामलों में कम खर्च वाली सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल, पारिवारिक समर्थन, और उच्च संख्या में बच्चे पैदा करने की सांस्कृतिक प्रवृत्ति के कारण शरीर की सहनशक्ति बनी रहती है।
यह अंतर सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है— यह एक गहरी चिंता का विषय है। हिंदू महिलाओं में सिजेरियन की अधिकता से शारीरिक कमजोरी, लंबा रिकवरी समय, आर्थिक बोझ और बच्चे पैदा करने के प्रति डर बढ़ता है। कई महिलाएं एक या दो बच्चे के बाद आगे बढ़ने से हिचकिचाती हैं। इससे परिवार छोटे होते हैं, और लंबे समय में आबादी पर असर पड़ता है। वहीं, जहां सामान्य डिलीवरी अधिक होती है, वहां महिलाएं शारीरिक रूप से मजबूत बनी रहती हैं और अधिक बच्चों को जन्म दे पाती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब संयोग है ? या फिर हमारे स्वास्थ्य तंत्र, प्राइवेट अस्पतालों की कमर्शियल सोच, और सामाजिक दबाव ने एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां हिंदू महिलाएं अनावश्यक सर्जरी का शिकार हो रही हैं ? क्या शिक्षा और जागरूकता के नाम पर डर फैलाया जा रहा है, ताकि बच्चे कम हों ?
यह चिंताजनक है! हिंदू समाज को जागना होगा। सरकार, डॉक्टर, समाज और महिलाओं से अपील करनी होगी।
- प्राइवेट अस्पतालों में अनावश्यक C-section पर सख्त रेगुलेशन, ऑडिट और पारदर्शिता (जैसे mandatory justification)।
- सरकारी अस्पतालों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, ज्यादा डॉक्टर-नर्स, नॉर्मल डिलीवरी को प्रोत्साहन (प्रशिक्षण, incentives)।
- महिलाओं को सही जानकारी: C-section कब जरूरी (placenta previa, fetal distress आदि), कब नहीं। WHO गाइडलाइंस फॉलो करें।
- परिवार/समाज में प्रेग्नेंसी को नेचुरल प्रोसेस मानें, डर न फैलाएं।
- सभी महिलाओं (हर समुदाय) के स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों के लिए जागरूकता अभियान—स्कूल, आंगनवाड़ी, सोशल मीडिया से।
- नीति स्तर पर: C-section दर पर राज्य-विशेष लक्ष्य, और प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप बेहतर बनाएं।
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✍️ साभार
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*🔏 लेखक : पंकज सनातनी

