जब रोटी महंगी हो जाए,तो नारे खुद निकलते हैं,ईरान में एक बार फिर सड़कों पर भीड़ है। इस बार वजह कोई विदेशी साज़िश नहीं,कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं बल्कि वही पुरानी चीज़ महंगाई। वो महंगाई जिसे हर सरकार पहले नकारती है फिर “अस्थायी” बताती है और अंत में जनता से कहती है सब्र रखो इबादत करो।
रोटी,तेल और सब्र तीनों खत्म, ईरान में हालात ऐसे हो गए हैं कि आम आदमी के लिए रोटी खरीदना मुश्किल है,तेल लग्ज़री बन चुका है और सब्र वो तो कब का खत्म हो गया। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जब लोग चिल्लाने लगे,तो हुकूमत को लगा “ज़रूर किसी ने भड़काया होगा” क्योंकि ईरान में अगर जनता नाराज़ है तो गलती जनता की नहीं हो सकती।
अयातुल्ला के देश में सवाल पूछना गुनाह , इस बार नारे सिर्फ़ महंगाई पर नहीं रुके। भीड़ ने सीधे अयातुल्ला अली खामेनेई का नाम लिया। ये वही देश है जहाँ:
* नेता पर सवाल = बगावत
* बगावत = साज़िश
* साज़िश = विदेशी हाथ
मतलब अगर पेट खाली है तो भी दोष बाहर वालों का।
कोम में हिंसा: जब पवित्र शहर भी चुप न रहे
सबसे “चौंकाने वाली” बात ये नहीं कि प्रदर्शन हुए बल्कि ये है कि कोम जैसे धार्मिक शहर में हिंसा हुई। कोम शहर जहाँ से फतवे निकलते हैं,जहाँ सत्ता को नैतिक वैधता मिलती है। अगर वहीं लोग सड़कों पर उतर आएँ,तो समझ लीजिए मसला सिर्फ़ महंगाई का नहीं रहा। अब ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या इबादत से पेट भर सकता है और ये सवाल हर तानाशाही को सबसे ज़्यादा डराता है।
सरकार का जवाब: लाठी,गोली और बयान
सरकार ने वही किया जो ऐसी सरकारें करती हैं:
* पहले इंटरनेट धीमा
* फिर सुरक्षा बल
* फिर बयान “स्थिति नियंत्रण में है”
कंट्रोल में जरूर है,बस जनता के गुस्से को छोड़कर।
विडंबना देखिए
ईरान खुद को इस्लामी क्रांति का मॉडल कहता है लेकिन आज वही मॉडल अपने ही नागरिकों से डर रहा है। क्रांति के नारे थे “इंसाफ,बराबरी और सम्मान” आज सच्चाई है महंगाई,बेरोज़गारी और खामोशी।
निष्कर्ष
ईरान की सड़कों पर जो गुस्सा दिख रहा है,वो अचानक नहीं है। वो सालों से जमा हुआ है महंगाई में,पाबंदियों में और बोलने की आज़ादी की कमी में। कोम की सड़कों पर उठा शोर बस इतना कह रहा है “जब पेट खाली हो तो डर भी कमजोर पड़ जाता है।”
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