धर्मो रक्षति रक्षितः (धर्म उसकी रक्षा करता है, जो धर्म की रक्षा करता है)।
यह महावाक्य केवल एक नारा नहीं है; यह अस्तित्व को बनाए रखने का एक सूत्र है। लेकिन आज के तथाकथित आधुनिक समाज में, एक नया वर्ग उभरा है जो बड़े गर्व से कहता है— "I am spiritual but not religious" (मैं आध्यात्मिक हूँ, किन्तु धार्मिक नहीं)।
यह वाक्य सुनने में बहुत क्रांतिकारी और मुक्त विचार वाला लगता है, लेकिन वास्तविकता में यह बौद्धिक आलस्य (Intellectual Laziness) और अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह वाक्य वह लोग बोलते हैं जो 'मोक्ष' तो चाहते हैं, लेकिन 'साधना' की आग में तपना नहीं चाहते। वे फल खाना चाहते हैं, लेकिन वृक्ष को पानी देने की जिम्मेदारी (धर्म और नियम) से भागते हैं।
हमें समझना चाहिए कि क्यों "बिना धर्म के आध्यात्मिकता" एक छलावा है और क्यों अनुष्ठानों (Rituals) की सूक्ष्मता को बचाए रखना ही अस्तित्व की रक्षा है।
*1. अनुशासन से भागने का नाम 'आधुनिकता' नहीं है*
जब कोई कहता है कि "मैं धार्मिक नहीं हूँ," तो उसका असली अर्थ अक्सर यह होता है कि— "मैं सुबह जल्दी नहीं उठ सकता, मैं नियमों का पालन नहीं कर सकता, मैं खान-पान पर संयम नहीं रख सकता, और मैं मंत्रों को सीखने का परिश्रम नहीं कर सकता।"
सच्ची आध्यात्मिकता (Spirituality) स्वच्छन्दता (Licentiousness) नहीं है; वह स्वतन्त्रता है। और स्वतंत्रता बिना अनुशासन के प्राप्त नहीं होती। पतंजलि योग सूत्र से लेकर भगवद गीता तक, हर ग्रंथ पहले 'यम' और 'नियम' (अनुशासन) की बात करता है।
यह कहना कि "मुझे अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं, मैं सीधा परमात्मा से जुड़ूँगा," अहंकार (Ego) का एक बहुत सूक्ष्म रूप है। यह ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि "मैं बिना स्कूल गए और बिना वर्णमाला सीखे सीधा साहित्यकार बनूँगा।" अनुष्ठान वह स्कूल है जो आपके अहंकार को तोड़ता है और चित्त को तैयार करता है।
*2. अनुष्ठान: केवल आस्था नहीं, चेतना की तकनीक (The Technology of Consciousness)*
आधुनिक आलोचक अक्सर पूछते हैं— "घंटी बजाने से क्या होगा? घी जलाने से क्या होगा? रंगोली बनाने से भगवान खुश हो जाएंगे क्या?"
ये प्रश्न अनुष्ठान के विज्ञान (Metaphysics of Ritual) की अज्ञानता से उपजते हैं। हिंदू धर्म में अनुष्ठान 'थिएटर' या नाटक नहीं है; यह एक तकनीक है।
*क. संवेदी विज्ञान* (Sensory Science):
हमारा मन हमारी पांच इंद्रियों (Senses) का गुलाम है। मंदिर का पूरा वास्तु और पूजा पद्धति इन इंद्रियों को 'हैक' करने के लिए डिज़ाइन की गई है ताकि चेतना को अंतर्मुखी किया जा सके।
गंध (Smell): _विशिष्ट धूप और अगरबत्ती की गंध सीधे हमारे लिम्बिक सिस्टम (मस्तिष्क का वह भाग जो यादों और भावनाओं को नियंत्रित करता है) को प्रभावित करती है, जिससे मन शांत होता है।_
ध्वनि (Sound): _संस्कृत मंत्रों का उच्चरण एक विशेष आवृत्ति (Frequency) पैदा करता है। 'घंटा' इस तरह बनाया जाता है कि उसकी ध्वनि से मस्तिष्क के बाएं और दाएं हिस्से में सामंजस्य स्थापित हो।_
दृश्य (Sight): _आरती की लौ पर ध्यान केंद्रित करना त्राटक क्रिया का हिस्सा है।_
*ख. पद्धति का महत्व (The Importance of Precision):*
रंगोली से लेकर ईंट रखने तक—हर चीज की एक 'पद्धति' है।
रंगोली और यन्त्र: _रंगोली केवल सजावट नहीं है। चावल के आटे या विशिष्ट रंगों से बनाए गए ज्यामितीय आकार (यन्त्र) ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। यह 'सेक्रेड ज्योमेट्री' (Sacred Geometry) है। यदि आप श्री यन्त्र बना रहे हैं और कोण गलत बना दिया, तो वह काम नहीं करेगा।_
यज्ञ की ईंटें: _वैदिक काल में 'शुल्व सूत्र' (ज्यामिति का प्राचीन ग्रंथ) का उपयोग करके यज्ञ वेदी बनाई जाती थी। पूर्व में क्या होगा, पश्चिम में क्या होगा, अध्वर्यु (पुरोहित) कहाँ बैठेगा—यह सब तय है क्योंकि यह एक ऊर्जा सर्किट बनाने जैसा है।_
यदि आप एक मोबाइल फोन चार्जर बना रहे हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि "लाल तार की जगह नीला तार लगा दो, क्या फर्क पड़ता है, बिजली तो बिजली है।" यदि आप तार बदलेंगे, तो डिवाइस फुक जाएगा। ठीक उसी तरह, अनुष्ठान वह 'सर्किट' है जो ब्रह्मांडीय चेतना को आपके व्यक्तिगत जीवन में उतारता है। उसमें मनमानी करने की गुंजाइश नहीं है।
*3. 'सेक्युलर हिंदू' और मंदिरों का बाज़ारीकरण*
समस्या तब विकराल हो जाती है जब यह तथाकथित "आधुनिक वर्ग" अपनी अनुशासनहीनता को मंदिरों पर थोपने लगता है। उनका तर्क होता है—
"मंदिर में जींस पहनकर क्यों नहीं जा सकते?"
"गर्भगृह में सबको जाने की अनुमति क्यों नहीं है?"
"रिचुअल्स पुराने जमाने की बात हैं, इन्हें बदलो।"
यह सोच मंदिरों को नष्ट कर देगी। मंदिर कोई 'पब्लिक हॉल' या 'मॉल' नहीं है जहाँ 'ग्राहक सदा सही है' (Customer is king) का नियम चले।
मंदिर 'देवता का आवास' (Devasthanam) है। वहाँ के नियम देवता (Deity) की प्रकृति और आगम शास्त्रों के अनुसार तय होते हैं, न कि आधुनिक लोकतंत्र या संविधान के अनुसार।
यदि आप कहते हैं कि "सब कुछ चलता है" (Anything goes), तो आप उस स्थान की पवित्रता (Sanctity) को खत्म कर रहे हैं। बिना 'रेड लाइन्स' (मर्यादा रेखाओं) के कोई भी स्थान पवित्र नहीं रह सकता। *मंदिर संपूर्ण हिन्दू समाज के लिए खुले होने चाहिए लेकिन मर्यादा की रेखाएं मंदिर ही तय करेगा।* जिस क्षण आप इन मर्यादाओं और शर्तों को मिटा देते हैं और विधियों को त्याग देते हैं, वहां से 'सान्निध्य' (Divine Presence) लुप्त हो जाता है और वह केवल पत्थर की इमारत रह जाती है। यहां आवश्यकता है कि मंदिर ही धार्मिक मर्यादाओं और अनुष्ठानों का महत्व समाज को सिखाए। इसलिए प्रत्येक मंदिर में एक धार्मिक पुस्तकालय होना नितांत आवश्यक है।
*4. इतिहास से सबक: प्रोटेस्टेंट सुधार और धर्म का पतन*
हमें इतिहास से सीखना चाहिए। यूरोप में जब प्रोटेस्टेंट रिफॉर्मेशन (Protestant Reformation) आया, तो उन्होंने भी यही तर्क दिया था जो आज के आधुनिक हिंदू दे रहे हैं।
उन्होंने कहा: "चर्च में इतनी रस्में क्यों? लैटिन भाषा क्यों? धूप और मोमबत्तियाँ क्यों? हमें सिर्फ जीसस और बाइबिल चाहिए, यह सब कर्मकांड हटाओ।"
उन्होंने अनुष्ठानों को हटा दिया और धर्म को केवल 'बौद्धिक विश्वास' (Intellectual Belief) तक सीमित कर दिया।
परिणाम क्या हुआ?
मात्र 400-500 वर्षों में यूरोप से ईसाई धर्म की पकड़ ढीली हो गई। आज यूरोप के भव्य कैथेड्रल खाली पड़े हैं, वे टूरिस्ट स्पॉट बन गए हैं, क्योंकि वहाँ कोई 'अनुभव' (Experience) नहीं बचा, केवल सूखी बातें बचीं।
अनुष्ठान वह 'पात्र' (Container) है जो धर्म के 'जल' को थाम कर रखता है। यदि आप पात्र को तोड़ देंगे, तो जल बिखर जाएगा। यदि हिन्दू धर्म अपने अनुष्ठानों, अपने यज्ञों, अपनी संध्या-वंदन और अपनी पूजा-पद्धतियों को छोड़कर केवल "फिलॉसफी" बन जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास "अनुभव" करने के लिए कुछ नहीं होगा, केवल किताबों में पढ़ने के लिए बातें होंगी।
*5. धर्मो रक्षति रक्षितः — वास्तविक अर्थ*
इसलिए, "धर्मो रक्षति रक्षितः" का अर्थ बहुत गहरा है।
धर्म (यहाँ अर्थ है- कर्तव्य, विधि, अनुष्ठान और नियम) आपकी रक्षा तभी करेगा जब आप उसकी रक्षा करेंगे।
जब आप 'पद्धति' की रक्षा करते हैं, तो पद्धति 'ऊर्जा' को सुरक्षित रखती है।
जब ऊर्जा सुरक्षित रहती है, तो वह देवता के चैतन्य को मंदिर में बनाए रखती है।
जब देवता का चैतन्य बना रहता है, तो समाज को मानसिक और आध्यात्मिक शांति मिलती है।
जो लोग कहते हैं "मान्यताओं में क्या रखा है", वे वास्तव में उस जड़ को काट रहे हैं जिस पर यह विशाल वटवृक्ष खड़ा है। आप व्यक्तिगत जीवन में कितने भी आधुनिक बनें, लेकिन जब आप परंपरा और धर्म के क्षेत्र में प्रवेश करें, तो आपको उन ऋषियों के ज्ञान के आगे नतमस्तक होना पड़ेगा जिन्होंने हजारों वर्षों के शोध (Research) के बाद ये विधियाँ बनाई हैं।
अपनी सुविधानुसार धर्म को तोड़ने-मरोड़ने के बजाय, हमें विनम्रता से यह स्वीकार करना चाहिए कि इन अनुष्ठानों के पीछे एक गहरा विज्ञान है जिसे हम शायद अभी पूरी तरह नहीं समझते। "आध्यात्मिक लेकिन धार्मिक नहीं" होना कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि एक भ्रम है। धर्म की रक्षा उसकी विधियों (Rituals) के पालन में ही है। जब हम विधि की रक्षा करेंगे, तभी विधि हमारी रक्षा करेगी।
-- डॉ. प्रिंस ठाकुर

