“मैंने भारत की लम्बाई और चौड़ाई तक पूरा भ्रमण किया तथा एक व्यक्ति को भी नहीं देखा जो भिखारी और चोर हो। मैंने इतनी सम्पत्ति को इस देश में देखा, इतने ऊँचे नैतिक आदर्श, इतने योग्य लोग, मैं नहीं सोचता कि हम इस देश को जीत पाएंगे जब तक कि हम इस देश की रीढ़ की हड्डी जो कि इसकी आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक परम्परा है, को नहीं तोड़ देते हैं।
इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हमें उनकी पुरानी व प्राचीन शिक्षा प्रणाली व संस्कृति को बदलना होगा। क्योंकि यदि भारतीय सोचते हैं कि जो कुछ विदेशी तथा अंग्रेजी वस्तु है, वह अच्छी तथा उनकी अपनी वस्तुओं से बेहतर है तो वे अपना आत्म-सम्मान, अपनी नैसर्गिक संस्कृति को खो देंगे तथा वे वही बनेंगे जो हम चाहेंगे, एक सचमुच का गुलाम देश।”

