28 जुलाई, 1952 को प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका TIME ने एक लेख प्रकाशित किया थाुं।
लेख की शुरुआत भारत के मद्रास राज्य (आज के तमिलनाडु) के सेलम जिले की एक पहाड़ी पर बने साधारण से भवन से होती है।
वहाँ 35 संन्यासी एक साथ रहते थे, प्रार्थना करते थे और तपस्वी जीवन बिताते थे। वे खुरदरे सूती कपड़ों से बने चमकीले भगवा वस्त्र पहनते थे। भोजन में केवल चावल, दाल और टैपिओका खाते थे। प्रार्थना के समय जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे। उनके पैरों में जूते-चप्पल भी नहीं होते थे, क्योंकि भारतीय परंपरा में पवित्र स्थानों पर जूते पहनकर प्रवेश करना उचित नहीं माना जाता।
पहली नज़र में कोई भी उन्हें हिंदू संन्यासी समझ बैठता।
लेकिन वे न तो हिंदू थे और न ही बौद्ध।
वे रोमन कैथोलिक भिक्षु थे।
यह था सिलुवैगिरि (पवित्र क्रॉस पर्वत) का बेनेडिक्टाइन मठ, और उसके प्रमुख थे 43 वर्षीय डॉम फिलिप कैपनप्लाकल।
फिलिप स्वयं ऐसे परिवार से आते थे जो सदियों से ईसाई था। एक पादरी होने के नाते वे भारत में ईसाई धर्म की धीमी प्रगति को लेकर चिंतित रहते थे।
उनकी दृष्टि में इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि मिशनरी भारतीयों के सामने केवल ईसाई मत के साथ यूरोपीय संस्कृति भी प्रस्तुत करते थे।
फिलिप ने अपने जीवन के शुरुआती छह वर्ष बेल्जियम और इटली में बिताए थे। वहीं उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि ईसाई धर्म और यूरोपीय संस्कृति दो अलग-अलग चीज़ें हैं।
भारत लौटने के बाद उन्होंने हिंदू संस्कृति और दर्शन का गहन अध्ययन शुरू किया।
जितना अधिक उन्होंने अध्ययन किया, उतना ही उन्हें लगा कि हिंदू संस्कृति के कई तत्व ईसाई आस्था के विरोध में नहीं हैं।
धीरे-धीरे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चर्च की मिशनरी गतिविधियों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह ईसाइयत को समझाने के लिए प्लेटो और अरस्तू जैसे यूनानी दार्शनिकों की अवधारणाओं का सहारा लेती है।
लेकिन भारत के सामान्य लोगों के लिए, जिनकी बौद्धिक परंपरा पश्चिमी दर्शन पर आधारित नहीं थी, ऐसी भाषा अक्सर दूर की और अर्थहीन लगती थी।
उन्होंने एक नई रणनीति पर विचार करना शुरु किया।फिलिप ने सोचना शुरू किया कि यदि ईसाइयत भारत में गहराई से जड़ें जमाना चाहता है, तो उसे भारतीय भाषा, भारतीय प्रतीकों और भारतीय जीवनशैली के माध्यम से व्यक्त होना होगा।
इसी सोच ने उन्हें एक नए रास्ते पर ला खड़ा किया।
उन्होंने कार्मेलाइट संप्रदाय छोड़कर कैथोलिक चर्च के सबसे पुराने मठवासी संगठन—बेनेडिक्टाइन ऑर्डर—को चुना। उनका विश्वास था कि सामूहिक श्रम, शिक्षा और उपदेश की उसकी परंपरा भारत में ईसाई मत की नई समझ विकसित करने के लिए सबसे उपयुक्त है।
पाँच वर्ष पहले उन्होंने सेलम में मठ की स्थापना का कार्य शुरू किया। इसके बाद वे दो वर्षों के लिए यूरोप गए, जहाँ उन्होंने बेनेडिक्टाइन प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1952 में, दो बेल्जियन सहयोगियों की सहायता से, यह मठ पूर्ण रूप से कार्यरत बेनेडिक्टाइन संस्थान बन गया।
हालाँकि फिलिप का विचार बिल्कुल नया नहीं था।
TIME ने अपने लेख में याद दिलाया कि लगभग 300 वर्ष पहले, 1606 में, इटली के जेसुइट मिशनरी रॉबर्ट डी नोबिली ने भी दक्षिण भारत में भगवा वस्त्र धारण किए थे और हिंदू संन्यासी की तरह जीवन बिताया था। उन्होंने उच्च जाति के हिंदुओं के बीच अनेक धर्मांतरण भी किए थे, हालांकि इसके लिए उन्हें चर्च के भीतर आलोचना का सामना करना पड़ा था।
फिलिप स्वयं भी भारतीयकृत ईसाई धर्म की इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे।
मठ में ईसाइयों को अपनी स्थानीय परंपराएँ बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। उदाहरण के लिए, ईसाई दुल्हनों को विवाह के समय पश्चिमी शैली की अंगूठी पहनाने के बजाय हिंदू रीति की तरह गले में धागा बाँधने की अनुमति दी जाती थी।
TIME ने एक स्थानीय हिंदू के शब्द भी उद्धृत किए।
उसने कहा—
"ये हमारे जैसे संन्यासी अधिक लगते हैं। शायद इनके धर्म में भी कुछ बात है।"
यही वह प्रतिक्रिया थी जिसे सुनकर डॉम फिलिप प्रसन्न होते थे।
क्योंकि उनके लिए यह केवल वस्त्र बदलने का प्रयोग नहीं था।
वे भारतीयों को यह समझाना चाहते थे कि ईसाई बनने के लिए जीवन शैली बदलने की जरूरत है
स्रोत: TIME Magazine, Religion: Benedict's Sanyasis (28 July 1952).
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