धर्म और मजहब ( रिलीजन ) के बीच का अंतर हमें समझना होगा । जो हमें काफिर , नापाक या पापी मानते हैं जो सिर्फ अपनी आसमानी किताब को मानते हों उनसे हमारा भाईचारा कैसे संभव हो सकता है ?
कमी कहीं नहीं है, केवल हिंदुओं के दिमाग को छोड़कर... हिंदुओं को अपने दिमाग से सेक्युलरिज्म और भाईचारे की बीमारी को बाहर निकालना चाहिए

