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होली का पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को आता है। इस दिन पूरा वातावरण रंगों, उत्साह और उल्लास से भर जाता है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग सभी आपसी भेदभाव भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और प्रेम तथा भाईचारे का संदेश देते हैं। होलिका दहन के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मनाया जाता है और अगले दिन रंगों के साथ जीवन में नई शुरुआत का उत्सव मनाया जाता है।
लेकिन होली जैसे पवित्र, रंगीन और प्रेम से भरे इस पर्व पर हम अक्सर एक बात बिना सोचे समझे कह देते हैं— '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐇𝐨𝐥𝐢'। शायद ही हम कभी रुककर सोचते हों कि हम ऐसा क्यों कहते हैं। क्यों नहीं "शुभ होली", "होली की हार्दिक शुभकामनाएँ", "रंगों भरी होली" या बस "होली है!" जैसे अपने शब्दों का प्रयोग करते हैं ?
यह सवाल छोटा जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी सांस्कृतिक कहानी छिपी हुई है।
लगभग 200 वर्षों तक भारत पर अंग्रेजों का शासन रहा। उस दौरान अंग्रेजी भाषा शिक्षा, प्रशासन, न्याय व्यवस्था और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। धीरे-धीरे अंग्रेजी शब्द हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इस तरह घुल गए कि कई बार हमें स्वयं भी इसका एहसास नहीं होता। '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐁𝐢𝐫𝐭𝐡𝐝𝐚𝐲', '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐍𝐞𝐰 𝐘𝐞𝐚𝐫' जैसे शब्दों की तरह त्योहारों के साथ भी '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐇𝐨𝐥𝐢' और '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐃𝐢𝐰𝐚𝐥𝐢' कहना आम होता चला गया। क्योंकि कार्ड, टेलीग्राम, फिर मैसेज, सोशल मीडिया में ये फिट बैठता था। अंग्रेज चले गए, लेकिन उनकी भाषा और बोलने का तरीका हमारे व्यवहार में कहीं न कहीं आज भी मौजूद है।
समय के साथ यह इतना सामान्य हो गया कि 'शुभ होली' कहना कुछ लोगों को पुराना या औपचारिक लगने लगा। आधुनिक दिखने की चाह में हम अक्सर अपनी ही भाषा के सुंदर शब्दों को पीछे छोड़ देते हैं। यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं सांस्कृतिक आत्मविश्वास से भी जुड़ा हुआ विषय है। जब कोई समाज अपनी भाषा और परंपरा के शब्दों को सहजता से प्रयोग करता है, तो वह अपनी पहचान को भी मजबूत करता है।
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यदि हम दूसरे समुदायों को देखें तो वे अपने त्योहारों की बधाई अपनी परंपरा से जुड़े शब्दों (अरबी/उर्दू) में ही देते हैं। मुसलमान 'ईद मुबारक' या 'रमज़ान मुबारक' कहते हैं। 'मुबारक' शब्द उनके धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ केवल शुभकामना नहीं बल्कि बरकत और दुआ भी होता है। इसी तरह ईसाई समुदाय '𝐌𝐞𝐫𝐫𝐲 𝐂𝐡𝐫𝐢𝐬𝐭𝐦𝐚𝐬' कहता है, जो उनकी परंपरा का हिस्सा है। वे' 𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐄𝐢𝐝' या '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐃𝐢𝐰𝐚𝐥𝐢' नहीं कहते बल्कि अपने त्योहारों को अपनी भाषा और परंपरा के शब्दों से जोड़कर देखते हैं।
हिंदू समाज स्वभाव से बहुत उदार और समावेशी रहा है। हमने अनेक संस्कृतियों और भाषाओं को सहजता से अपनाया है। यह हमारी शक्ति भी है। लेकिन कभी-कभी यह लचीलापन इतना बढ़ जाता है कि हम अपनी ही भाषा के सुंदर शब्दों को भूलने लगते हैं। 'शुभ होली' या 'होली की हार्दिक शुभकामनाएँ' कहना केवल परंपरा निभाना नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का भी एक छोटा सा माध्यम है।
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि होली का वास्तविक संदेश भी यही है कि मन के भीतर की बुराइयों को जलाकर प्रेम, क्षमा और अपनापन बढ़ाया जाए। होलिका दहन हमें यह याद दिलाता है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है, जबकि श्रद्धा और सत्य की जीत होती है। अगले दिन जब हम रंग खेलते हैं तो यह संदेश देते हैं कि समाज में भेदभाव नहीं, बल्कि समानता और प्रेम होना चाहिए। होली हमें यह भी सिखाती है कि पुराने मनमुटाव भूलकर जीवन में नई शुरुआत करनी चाहिए। लेकिन अगर हम '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐇𝐨𝐥𝐢' कहकर अपनी भाषा की कड़वाहट (या कमी) को छिपा रहे हैं, तो क्या हम असली होली मना रहे हैं ?
इतिहास में भी होली का उत्सव बहुत व्यापक रूप से मनाया जाता रहा है। ब्रज क्षेत्र, विशेषकर वृंदावन और बरसाना में यह पर्व अत्यंत विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। यहाँ की लठमार होली, फूलों की होली और रंगोत्सव देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के समय से ही ब्रजभूमि में होली का यह उत्सव अत्यंत आनंद और भक्ति के साथ मनाया जाता रहा है। यहाँ रंग केवल गुलाल का नहीं होता, बल्कि भक्ति, प्रेम और संस्कृति का भी होता है।
मध्यकाल में भी कई मुस्लिम शासकों ने होली के उत्सव में भाग लिया। कुछ स्थानों पर इसे 'ईद-ए-गुलाबी' या 'आब-ए-पाशी' के रूप में भी मनाया गया। इसका अर्थ यह है कि यह पर्व सदियों से लोगों को जोड़ने का माध्यम रहा है। लेकिन उस समय भी लोग अपने-अपने सांस्कृतिक शब्दों और परंपराओं के साथ ही त्योहार को अपनाते थे। लेकिन उन्होंने '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐇𝐨𝐥𝐢'" नहीं कहा— अपनी भाषा में अपनाया। हम क्यों नहीं कर सकते ?
आज के समय में सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली ने हमारी भाषा और व्यवहार पर बहुत प्रभाव डाला है। ट्रेंड और फैशन के चलते कई बार हम बिना सोचे समझे वही शब्द अपनाते हैं जो हमें हर जगह दिखाई देते हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी जागरूकता के साथ अपनी भाषा के शब्दों का प्रयोग करें, तो यह छोटा सा बदलाव भी हमारी संस्कृति के प्रति सम्मान का प्रतीक बन सकता है।
यदि हम '𝐇𝐚𝐩𝐩𝐲 𝐇𝐨𝐥𝐢' की जगह 'शुभ होली' या 'होली की हार्दिक शुभकामनाएँ' कहना शुरू करें, तो इससे किसी का नुकसान नहीं होगा। बल्कि इससे नई पीढ़ी को यह समझ आएगा कि हमारे त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, भाषा और परंपरा की पहचान भी हैं।
होली का असली रंग वही है जो दिलों को जोड़ता है। जब हम अपने त्योहारों को अपनी भाषा और परंपरा के साथ मनाते हैं, तो वह रंग और भी गहरा हो जाता है। इसलिए इस होली पर हम एक छोटा सा संकल्प ले सकते हैं— अपने त्योहारों की शुभकामनाएँ अपनी भाषा में दें, अपने बच्चों को इनके पीछे की कथा और संदेश बताएं, और अपनी संस्कृति के रंग को गर्व के साथ आगे बढ़ाएं।
क्योंकि असली होली तभी होती है जब हम केवल बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से भी अपने संस्कारों और परंपराओं के रंग में रंगे हों।
आप सभी को रंगों, प्रेम और उल्लास से भरी होली महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। 🌸🙏
✍️ साभार
🔏 लेखक : पंकज सनातनी
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