संकटकाल में हिंदुस्तानियों का नागरिक बोध कब होगा जागृत_ ?
रत्तीभर दिक़्क़त मंजूर नहीं? जरा सा संकट आया नही कि हो गए शुरू, हाय अब क्या होगा? अब तो ' बड़े ' हो जाओ, बातें बड़ी बड़ी करवा लो, वक़्त आने पर दम तोड़ देती है सब बहादुरी, जरा सी परेशानी झेल नही सकते? भारत मे तो युद्ध है ही नहीं, अगर मुल्क़ युद्धग्रस्त हो गया तो क़्या हाल करेंगे देश का यहां के नागरिक?
एकाएक सबके घरों में गैस टँकी हो गई ख़त्म..!!, लगा दी लंबी लाइन, शुरू हो गए सरकार को कोसना, वाह रे भारतीयों..!! आदिमयुग ' की आदतों से अब तो बाज आ जाओं रे देशवासियों, थोड़ा तो धैर्य धीरज रखो संकटकाल में तो देश की सरकार व प्रतिनिधि पर विश्वास करो, सड़क से संसद तक कोहराम मचाकर देश को विपदा में ना डालो
कुछ तो सीखों हिंदुस्तानियों, एक देश के नाते देशवासियों का क्या कर्तव्य होता हैं? वह भी संकटकाल में। कुछ नही तो मध्यपूर्व के उन देशों से ही सीख लो, जहां बम, बंदूक, बारूद, तोप-गोले, मिसाइलें बरस रहीं हैं। खाएं-पिये-अघाये अरब देशों से नही, मिडिल ईस्ट के उन देशों से सीखिए जो पहले से ही अभावों में जी रहे हैं। युद्ध की विभीषिका के बीच भी वहां के नागरिकों का हौसला-हिम्मत-जज़्बा देखने लायक़ हैं। सामने बाहुबली अमेरिका व इज़राइल जैसे देश हैं। तमाम आधुनिक अस्त्र-शस्त्र से लैस ये बाहुबली मनमानी पर आमादा हैं लेकिन मज़ाल हैं इन छोटे छोटे मुल्कों औऱ वहां के बाशिंदों की हिम्मत तोड़ पाए। तमाम प्रतिकूलता के बावजूद वहाँ जंग के बीच ज़िंदगी हार नहीं मान रही हैं। वहां रमज़ान भी चल रहा हैं। रोज़े भी हो रहें हैं। सेहरी-इफ्तारी के साथ ईबादत भी हो रही हैं। नागरिकों ये जिजीविषा ही एक मुल्क़ की सबसे बड़ी ताक़त होती हैं और ये ही ताक़त निरकुंश ताक़तों को अंतत्वोगत्वा परास्त करती हैं।...और हम हिंदुस्तानी क्या कर रहें हैं?
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नितिनमोहन शर्मा
हम हिंदुस्तानी गेस की टँकी लेकर लाइन में लगे हैं। पेट्रोल की टँकी फूल करवा रहे हैं। सिलेंडर की कालाबाजारी कर रहें हैं। गेस भट्टी व इंडक्शन चूल्हे के दाम मनमर्ज़ी से अनाप शनाप बढ़ा रहे हैं। एक की जगह चार-छह सिलेंडर का स्टॉक कर रहें हैं। सरकारों को कोस रहे हैं। सड़क पर चूल्हे जला रहें हैं। संसद ठप कर रहें हैं। संसद के द्वार पर गैस की टँकी लेकर बैठ रहें हैं। सुबह से शाम तक गेस एजेंसियों के सामने लगी कतारे-नज़ारे दिखा रहे हैं। सरकारों को कोस रहें हैं। पहले हुए आंदोलन की आड़ में नए सिरे से अराजकता पैदा कर रहें हैं। मुल्क़ में एक तरह की घबराहट पैदा कर रहें हैं। वह भी बिना युद्ध के। क़्या ऐसा होता हैं एआई के दौर का कोई मुल्क़ और उसके बाशिंदे व वहां की राजनीति?
हम हिंदुस्तानी क्या उस नागरिक बोध का पालन कर रहें हैं, जो संकटकाल में देश के हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए। हम अपने अधिकारों के लिए तो सड़कों पर आ गए लेकिन कर्तव्यों का कुछ भी भान क्यों नही? अधिकार के आप अधिकारी है तो कुछ कर्तव्य भी आपके हैं इस देश के प्रति। युद्धग्रस्त दुनियावी माहौल में भी हम अपने कर्तव्यों का पालन न करेंगे तो कब करेंगे? आख़िर हम कब ' बड़े ' होंगे? बाते तो हम सब बड़ी बड़ी करते हैं कि भारत को ये कर देना चाहिए, वो कर लेना चाहिए लेकिन जरा सी दिक्कत आई नही की हो गए शुरू-हाय मेरा क्या होगा? मेरे परिवार का क्या होगा? मेरे काम धंधे, नफ़े-मुनाफ़े का क्या होगा?_
_क्या देश के नागरिक का संकटकाल में भी चिंतन-मंथन सिर्फ स्वयम की सुख सुविधा व ' लक्ज़री ' के इर्दगिर्द ही केंद्रित रहेगा? जबकि अभी युद्ध तो हमारे मुल्क़ में है ही नहीं? हम तो अभी रंगों वाली होली मना रहे थे और सड़कों पर क्रिकेटिया जीत का जश्न। अब गणगौर मनाएंगे और फ़िर चेत्र नवरात्रि। बावजूद इसके एकदम से देश मे ऐसा हल्ला मच गया, मानों मध्यपूर्व देश का युद्ध हिंदुस्तान के मुहाने पर आ गया। अगर सच मे भारत किसी बड़े व लंबे युद्ध मे उतर गया या फंस गया तो फ़िर क्या हाल होगा हमारे देश का? सोचकर ही दुःख होता हैं, बेहद शर्म भी आती हैं। जबकि हाल फ़िलहाल ऐसी कोई स्थिति भारतवर्ष में दूर दूर तक नहीं कि हम किसी बड़ी परेशानी से रूबरू हो। बावजूद इसके मुल्क़ व मुल्क़ के बाशिंदों में जरा सा भी धैर्य-धीरज नहीं।_
_क्या हमें रत्तीभर भी दिक़्क़त मंजूर नहीं? अगर नहीं है तो भूल जाओ की भारत विश्व गुरु बनेगा। ऐसे भयभीत समाज के साथ कोई भी राष्ट्र जगतगुरु नही बनता। उसके लिए जीवटता वाला नागरिक समाज जरूरी होता हैं। सिर्फ़ सोशल मीडिया पर या भाषणों में गाल बजाने से देश, दुनियां का सिरमौर राष्ट्र नहीं बनता। ये तो सर्वविदित था कि खाड़ी देश मे युद्ध छिड़ा है तो देर सबेर एलपीजी व पेट्रोल-डीज़ल का संकट गहरायेगा। पूर्व में भी, जब जब मिडिल ईस्ट के देशों में जंग छिड़ी, असर हमारी रसोई व पेटोल पंप पर आया ही हैं। अब नए दौर का नया भारत हैं न? तो फ़िर रंगढंग वही पुरातन क्यों? वही ' आदिमयुग ' की सोच क्यों? कि बस में और मेरा घर सुरक्षित, शेष चूल्हें में जाये।_
में झट से टँकी भरवा लू। एक भरी है तो दूसरी-तीसरी भी भरवाकर रख लू, क्या पता बाद में मिले न मिले? दो पहिया-चार पहिया की टँकी भी फूल करवा लू। ये सब सिर्फ़ इस अंदेशे में कि कल मिले न मिले? जब संसाधनों के प्रति कल की इतनी ही चिंता है तो ये चिंतन भी क्यो नही- कल हो न हो? जब कल का ही तय नही तो फ़िर इतनी हायतौबा-हल्ला हो हल्ला क्यों? एक दो सिलेंडर भर जाने से, पेट्रोल टँकी फूल हो जाने से शेष जीवन कट जायेगा? फ़िर जरूरत ही नही पड़ेगी गेस की, पेट्रोल-डीज़ल की? ऐसा नहीं न? तो फ़िर क्यो मुल्क़ में घबराहट-पैनिक पैदा करना। कुछ भरोसा देश पर नही तो अपने ईष्ट पर भी तो किया जा सकता हैं न कि ईश्वर सब जल्द ठीक कर देंगे..!! है कि नही?_
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धिक्कार हैं आपदा में दाम बढ़ाने वालों पर..दुःखद हैं राजनीति करने वालों पर
_धिक्कार हैं उस बाज़ार पर जो आपदा में मुनाफ़े व कालाबाजारी का अवसर तलाश रहा हैं। थू थू है उस कारोबारी पर जो ऐसे संकट के समय में कचोरी-समोसा-पोहे का दाम बढ़ा रहा हैं। जो इंडक्शन चूल्हे व गेस भट्टी के दाम बढ़ा रहा हैं। जो एजेंसी गोदाम भरा होने के बाद भी गेस सिलेंडर का कृतिम अभाव पैदा कर रहीं हैं। धिक्कार तो उन्हें भी है जो एक दो नही, पांच-दआ सिलेंडरों का स्टॉक कर बैठे हैं या उसकी जुगत में जुटे हैं। लानत तो उन्हें भी जो सड़क से लेकर संसद तक एकदम से हल्ला मचाने लग गए हैं। गेस संकट का हवाला देकर पूर्ववर्ती आंदोलन का उदाहरण दे धरने प्रदर्शन कर रहें हैं। ऐसे तत्व, संगठन, दल व नेताओं को सोचना चाहिए कि ये युद्धकाल हैं। भले ही मुल्क़ इसमे शामिल नही लेकिन युद्ध के प्रभाव से अछूता भी नही। सामान्य हालातो में गैस संकट या दाम बढ़ने के मामले को वर्तमान के युद्ध संकट से जोड़कर जो राजनीति शुरू करना भी दुःखद हैं। संकटकाल में तो कम से कम देश की हुकूमत व हुक्मरानों पर भरोसा होना चाहिए न? राजनीतिक व वैचारिक मतभेद भले ही कितने गहरे हो। ये वक़्त सड़क पर चूल्हा जलाने व संसद के द्वार पर गैस की टँकी लेकर बैठ जाने का नहीं। मोदी सरकार से हिसाब किताब करने के अभी अनेक अवसर आएंगे। संसद से सड़क तक कोहराम मचाकर आपदा में तो अवसर न तलाशें। अब तो बड़े हो जाइए। एक मुल्क़ के नाते, एक नागरिक के नाते, एक लोकतांत्रिक देश के नाते...!!

