जय श्री राम।।
राम राज्य बहुत ही सुखपूर्वक चल रहा है।
सब अपने अपने धर्म का पालन करते हुए,।
अपने अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।
सभी के घरों में वेद पुराणों की सुन्दर कथांए होती है।
रामजी के चरित्र का गुणगान होता है।
*सब के गृह गृह होंहि पुराना।*
*रामचरित पावन बिधि नाना।।*
बालक घरों में तोता मैना को पढ़ाते हैं,
*कहो राम रघुपति सुक सारिका पढावहिं बालक।*
*कहहु राम रघुपति जनपालक।।*
रामजी के सखाओं को यह याद ही नहीं रहा,।
कि हम अपना घर बार छोड़कर अयोध्या में रह रहे हैं।
छै माह बीत गए।
*बिसरे गृह सपनेहुं सुधि नाहीं।।*
सपने में भी घर की सुध नहीं है।
*जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।।*
रामजी ने एक दिन अपने सब सखाओं को बुलाया,।
और कहा।
तुमने मेरी बहुत सेवा की है।
तुम्हारे मुख पर मैं किस प्रकार तुम्हारी बढ़ाई करुं।
*तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई।*
*मुख पर केहि बिधि करौं बढ़ाई।।*
मेरे हित के लिए तुम लोगों ने अपने घरों का त्याग किया ।
सब सुखों को त्यागा।
सब मुझे प्रिय है, ।
किन्तु तुम्हारे समान मुझे और कोई प्रिय नहीं है ।
*सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना*
अब आप सब लोग अपने-अपने घर चले जाओ।
और वहां नियम से मुझे भजते रहना।
मुझे सर्व व्यापक जानकर मुझसे प्रेम करना।
*अब गृह जाहु सखा सब, भजेहु मोहि दृढ़ नेम,सदा सर्वगत सर्व हित ,जानि करेहु अति प्रेम।।*
भगवान की आज्ञा सुनकर सब सखा प्रेम मगन होकर कुछ कह नहीं सके।
बस टक टकी लगाकर भगवान की ओर देखने लगे।
भगवान ने उन सबके लिए सुंदर कपड़े और गहनें मंगवाए।
भरत जी ने अपने हाथों से सुग्रीव जी को वस्त्र और आभूषण पहनाऐ।
अंगद जी के प्रेम को देखकर भगवान ने उन्हें नहीं बुलाया।
भरत जी और लक्ष्मण जी के द्वारा राम जी के सब शाखाओं की विदाई हुईं।
अंगद जी हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगे।
अंगद जी ने कहा है कृपा निधान मरते समय मेरे पिता ने मेरी बांह आपको थमा कर गए थे।
आप मेरा त्याग मत कीजिए।
अब मैं कहां जाऊंगा।
मुझे आपकी शरण में रहने की अनुमति प्रदान कीजिए।
अब तो मेरे गुरु पिता माता सब कुछ आप ही हो।
हे प्रभु आप ही विचार कीजिए अब मेरा घर पर क्या काम है ।
मैं आपकी सेवा में ही रहूंगा।
मैं घर की सब नीचे से नीचे की सेवा करुंगा।
और आपके चरण कमल के दर्शन करके भवसागर से तर जाऊंगा।
है प्रभु अब आप मुझे यह ना कहना कि घर जाओ।
अंगद जी के इस तरह के वचन सुनकर भगवान के नेत्र सजल हो गए ।
उन्होंने अंगद जी को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।
अंगद जी के प्रेम को देखकर भगवान ने अपने हृदय की माला वस्त्र और रत्न जटित आभूषण अंगद जी को पहनाकर।
कई तरह से समझा कर उन्हें विदा किया।
किसी ने राम जी से कहा कि आप सबको विदा कर रहे हो। आप हनुमान जी से तो अपने घर जाने को कह ही नहीं रहे हो।
आप इन्हें भी अपने घर जाने को कहो।
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा। जिन लोगों के अपने-अपने घर है उन्हें मैंने अपने घर जाने को कह दिया है।
हनुमान जी का तो कोई घर ही नहीं है।
मैं उन्हें अपने घर जाने का कैसे कहूं।
और फिर इनका जन्म तो मेरे कार्य को संपन्न करने के लिए ही हुआ है।
इन्हें मैं कैसे कहूं कि अपने घर जाओ।
और एक कारण है।
मैं हनुमान जी का ऋणि हूं।
आप सब लोग जानते हो ।
जब कोई किसी का ऋणि हो तो उसे आदेश कैसे कर सकता है।
इसलिए मैं इन्हें जानें को नहीं कह सकता हूं।
रामजी द्वारा यह वचन सुनकर हनुमानजी रामजी के चरणों में लेट गए।
हनुमान जी ने सुग्रीव जी से प्रार्थना की।
कि मैं कुछ दिन राम जी की सेवा में रहकर फिर आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊंगा।
सुग्रीव जी ने कहा नहीं हनुमान अब तुम्हें मेरी सेवा करने की आवश्यकता नहीं है।
भगवान ने तुम्हें अपनी सेवा में सदा सदा के लिए रख लिया है।
यह सुनकर हनुमानजी अति प्रसन्न हुए।
इस तरह सब लोगों को भगवान ने अपने-अपने घरों के लिए विदा किया ।
अंगद जी बार-बार पलट कर राम जी की ओर इस आशा से देख रहे हैं।
कि कहीं प्रभु मुझे यहीं ठहरने का आदेश कर दें।
हालांकि सब रामायण प्रेमी भक्त मुझसे ज्यादा ज्ञान रखने वाले हैं।
फिर भी इस प्रसंग के बारे में एक बार में पुनः कहूंगा।
कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न आ सकता है।
कि हनुमानजी सुग्रीव जी की सेवा में क्यों थे?।
इस प्रसंग पर पहले कथा लिखी जा चुकी है।
फिर भी मैं पुनः इस प्रसंग पर प्रकाश डालना चाहूंगा ।
कि हनुमान जी महाराज के गुरु भगवान सूर्य है ।
और सुग्रीव जी सूर्य भगवान के पुत्र हैं।
भगवान सूर्य से हनुमान जी महाराज ने दीक्षा प्राप्त की थी।
जैसा कि हम सब जानते हैं ।
दीक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात गुरु दक्षिणा में कुछ देने की परम्परा हमारे सनातन धर्म की रही है।
हनुमानजी महाराज को उनके गुरुदेव सूर्य भगवान ने सुग्रीव जी की सेवा में रहने की गुरु दक्षिणा मांगी थी।
इसलिए हनुमान जी सुग्रीव जी की सेवा में थे।
*इसके आगे का प्रशंग अगली पोस्ट में जय श्री राम।।*

