पार्ट : 1
पूरी दुनिया 1 जनवरी को नए साल के रूप में मनाती है, लेकिन भारतीय परंपरा में नववर्ष का आधार केवल कैलेंडर नहीं, बल्कि प्रकृति और खगोलीय गणना है। हिंदू नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है, और वर्ष 2026 में यह शुभारंभ आज के दिन हो रहा है। आज से विक्रम संवत 2083 का आरंभ हुआ है, जो भारतीय कालगणना की निरंतरता और प्राचीन ज्ञान का प्रमाण है।
प्रस्तावना : गुड़ी पड़वा पूरे भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सूर्योदय होने पर सबसे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि की संरचना शुरू की। उन्होंने प्रतिपदा तिथि को सर्वोत्तम तिथि कहा था इसलिए इसको सृष्टि का प्रथम दिवस भी कहते हैं।
भारत का सर्वमान्य संवत विक्रम संवत है जिसका प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा कहा जाता है। इस दिन हिन्दू नववर्ष का आरंभ होता है। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार सोमरस चंद्रमा ही औषधियों, वनस्पतियों को प्रदान करता है इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है। इस दिन पूरनपोली बनाई जाती है तथा कड़वा नीम का सेवन आरोग्य के लिए अच्छा माना जाता है।
🔰 ब्रह्म पुराण में गुड़ी पड़वा :-
ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का प्रारंभ हुआ था और इसी दिन भारत वर्ष में काल गणना प्रारंभ हुई थी। कहा है कि—
_चैत्र मासे जगद्ब्रह्म समग्रे प्रथमेऽनि।_
_शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति॥_
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से संवत्सर का पूजन, नवरात्र घटस्थापना, ध्वजारोपण आदि विधि-विधान किए जाते हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसंत ऋतु में आती है। इस ऋतु में संपूर्ण सृष्टि में सुंदर छटा बिखर जाती है। 'प्रतिपदा' के दिन ही पंचांग तैयार होता है।
महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए 'पंचांग' की रचना की। इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत काल गणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में 'गुड़ी पड़वा' कहा जाता है। गुड़ी का अर्थ 'विजय पताका' होता है।
🔰 इतिहास की नजर से :-
इस नवसंवत्सर का इतिहास बताता है कि इसी दिन आज से 2070 वर्ष पूर्व 'उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य' ने विदेशी आक्रांताओं से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की।
कहा जाता है कि देश की अक्षुण्ण भारतीय संस्कृति और शांति को भंग करने के लिए उत्तर-पश्चिम और उत्तर से विदेशी शासकों ने इस देश पर आक्रमण किए और अनेक भूखंडों पर अपना अधिकार कर लिया और अत्याचार किए जिनमें एक क्रूर जाति के शक तथा हूण थे। ये लोग पारस कुश से सिंध आए थे। सिंध से सौराष्ट्र, गुजरात एवं महाराष्ट्र में फैल गए और दक्षिण गुजरात से इन लोगों ने उज्जयिनी पर आक्रमण किया। शकों ने समूची उज्जयिनी को पूरी तरह विध्वंस कर दिया और इस तरह इनका साम्राज्य विदिशा और मथुरा तक फैल गया।
इनके क्रूर अत्याचारों से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई तो मालवा के प्रमुख नायक विक्रमादित्य के नेतृत्व में देश की जनता और राजशक्तियां उठ खड़ी हुईं और इन विदेशियों को खदेड़कर बाहर कर दिया। इस पराक्रमी वीर महावीर का जन्म अवंति देश की प्राचीन नगर उज्जयिनी में हुआ था जिनके पिता महेन्द्रादित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दंपति ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान भूतेश्वर से अनेक प्रार्थनाएं एवं व्रत उपवास किए।
सारे देश में शक के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए विक्रमादित्य को अनेक बार उससे उलझना पड़ा जिसकी भयंकर लड़ाई सिन्ध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई जिसमें शकों ने अपनी पराजय स्वीकार की। इस तरह महाराज विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया जिसे 'विक्रमी शक संवत्सर' कहा जाता है।
सबसे प्राचीन काल गणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में अभिषिक्त किया। कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्मा जी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुरू होता है अत: इस तिथि को 'नवसंवत्सर' भी कहते हैं।
नवसंवत्सर से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नवसंरचना के लिए ऊर्जस्वित हो रही है। मनुष्य, पशु-पक्षी एवं प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग कर सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।
कहा जाता है कि यूनानियों ने हिंदू कैलेंडर की नकल कर इसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया। आज भले ही दुनियाभर में अंग्रेजी कैलेंडर का प्रचलन हो गया हो लेकिन फिर भी भारतीय कैलेंडर की महत्ता कम नहीं हुई। भारत में आज भी किसी भी व्रत-त्यौहार, महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि, विवाह व अन्य सभी शुभ कार्यों को करने के मुहूर्त आदि भारतीय कैलेंडर के अनुसार ही देखते हैं।
मगर आधुनिक सभ्यता की अन्धी दौड़ में समाज का एक वर्ग इस पुण्य दिवस को विस्मृत कर चुका है। आवश्यकता है कि इस दिन के इतिहास के बारे में जानकारी लेकर प्रेरणा लेने का कार्य करें। भारतीय संस्कृति की पहचान विक्रमी संवत्सर में है, न कि अंग्रेजी नववर्ष से। हमारा स्वाभिमान विक्रमी संवत्सर को मनाने से ही जाग्रत हो सकता है, न कि रात भर झूमकर एक जनवरी की सुबह सो जाने से। इसका सशक्त उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का यह कथन है, जिसे उन्होंने 1 जनवरी को मिले शुभकामना सन्देश के जवाब में कहा था कि, "मेरे देश का सम्मान वीर विक्रमी नव संवत्सर से है। 1 जनवरी गुलामी की दास्तान है।"
1 जनवरी का महत्व वैश्विक संपर्क के लिए हो सकता है, लेकिन हमारी पहचान, हमारी आत्मा और हमारी संस्कृति हिंदू नववर्ष में ही बसती है। यदि हम अपनी परंपराओं को भूल जाते हैं, तो धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खो देते हैं।
हिंदू नववर्ष हमें केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर देता है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में नई ऊर्जा लाएं, अपने कर्तव्यों को समझें, और अपने धर्म व राष्ट्र के प्रति जागरूक बनें। यह केवल नया साल नहीं, बल्कि नए संकल्प, नए विचार और नए भारत की दिशा में एक कदम है।
आइए, इस नवसंवत्सर पर हम यह संकल्प लें कि हम अपनी संस्कृति पर गर्व करेंगे, अपने इतिहास को जानेंगे, और आने वाली पीढ़ियों को भी इसका महत्व समझाएंगे। यही सच्चा उत्सव है, यही सच्चा नववर्ष है।
आप सभी देशवासियों को हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 की हार्दिक शुभकामनाएं— यह नववर्ष आपके जीवन में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और आत्मबल का प्रकाश लेकर आए। 🚩
✍️ साभार
[ लेखक : पंकज सनातनी ]
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